Tax free New Indian Economic System

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    सारे टैक्स माफ कर दें तो आएगी क्रांति!
    प्रणव प्रियदर्शी
    Friday August 31, 2012

    लंबे अर्से बाद उस दिन अतुल देशमुख से मुलाकात हुई। नागपुर के रहने वाले अतुल पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं। उनके साथ औरंगाबाद के अनिल बोकिल भी थे। अनिल से मेरी यह पहली मुलाकात थी। पता चला दोनों बाबा रामदेव से मिलने दिल्ली आए हैं (जो उन दिनों रामलीला मैदान में डटे हुए थे)। बाबा से मिलने की कोई खास वजह?

    आजकल हम हर उस शख्स से मिल रहे हैं जो हमारी अर्थ क्रांति के प्रस्तावों से सहमत हो सकता है और उसे आगे बढ़ाने में मददगार हो सकता है। जवाब अतुल ने दिया, लेकिन अनिल बोकिल भी उसमें शामिल थे।

    अब यह अर्थक्रांति क्या बला है? अब तक तरह-तरह की क्रांतियों के नाम सुन-सुनकर कान पक चुके हैं। टीम अन्ना भी अनशन के ताजा दौर को जारी नहीं रख सकी अनशन समाप्त करने के लिए क्रांति की घोषणाओं की ही आड़ ली। बाबा रामदेव भी कोई न कोई क्रांति ही करने वाले हैं। अब आप यह नई अर्थ क्रांति लेकर आए हैं। क्या है इसमें और क्यों सुनूं मैं?

    आप तो इसलिए सुनेंगे क्योंकि देश और समाज की जो मौजूदा दशा और दिशा है उससे आप असंतुष्ट हैं। दूसरी वजह यह है कि जितनी भी क्रांतियों की बात आपने की, उनमें से कोई भी ऐसी नहीं है जो आपको संतुष्ट कर पाई हो। मैं आपसे पूछूं कि जन लोकपाल बिल से करप्शन मिट जाएगा तो आप किंतु-परंतु पर उतर आते हैं। बाबा रामदेव बाहर से सारी ब्लैकमनी ले भी आएं तो क्या उसके बाद ब्लैकमनी बननी बंद हो जाएगी? आपके पास जवाब नहीं है। इसलिए आपको हमारी बात धैर्य से सुननी चाहिए।

    अजीब जबर्दस्ती है।

    मुस्कुराते हुए बोले अतुल, जबर्दस्ती नहीं है। हम आपसे यह नहीं कह रहे कि आप हमारी बातें मान ही लो, पर सुनने का केस तो बनता है। अगर सुने बगैर हमारी बातें खारिज करना आपको ठीक लगता हो तो फिर..

    अब मैंने हथियार डालते हुए कहा, प्रभो, सुनाइए अपनी बात.. मैं सरेंडर करता हूं।

    इसके बाद के करीब एक घंटे अतुल और अनिल बोलते रहे.. मुझ पर उन बातों का क्या असर हुआ और मैं उन बातों से कितना सहमत-असहमत हूं, यह बाद में। पहले उनकी बातें, जो मैं सहमत हूं, मेरे सुनने लायक थीं और आपके पढऩे लायक हैं।

    अर्थक्रांति की यह अवधारणा मूलत: अनिल बोकिल की है। अतुल उन चंद लोगों में हैं जिन्होंने सुनने, समझने के बाद इसे आगे बढ़ाने का काम अपने हाथ में लिया है। इनके मुताबिक बस पांच कदम हैं। अगर वे पूरी दृढ़ता से उठा लिए जाएं तो देखते-देखते हमारे देश और समाज को विकास ही नहीं, चेतना के भी नए धरातल पर पहुंचा सकते हैं। वहां हम, हमारे आसपास के लोग, उनकी सोच, उनकी चुनौतियां, उनकी उपलब्धियां, उनके मुद्दे सब इस कदर भिन्न होंगे कि तब यह कल्पना करना भी मुश्किल होगा कि वह हम ही हैं जो कुछ समय पहले तक करप्शन, क्राइम और ब्लैकमनी जैसी आसान बीमारियों को लाइलाज मानते थे। ये पांच कदम हैं –

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    एक, मौजूदा टैक्स ढांचे का पूरी तरह खात्मा करते हुए सारे टैक्स बंद कर दिए जाएंगे (दो टैक्सों – आयात-निर्यात शुल्क और कस्टम ड्यूटी को छोड़ कर)।
    दो, बैंक ट्रांजैक्शन टैक्स इकलौता टैक्स होगा जो हर शख्स को देना होगा। यह टैक्स बैंक में पैसा जमा कराते वक्त लगेगा जो जमा की जाने वाली रकम का एक छोटा-सा हिस्सा, फिलहाल मान लेते हैं 2 फीसदी, होगा। (हालांकि लागू होने के बाद यह हिस्सा और कम बैठेगा।) ध्यान देने की बात यह है कि खर्च पर किसी तरह का कोई टॅक्स नही लगेगा
    तीन, कैश ट्रांजैक्शन पर कोई टैक्स नहीं लगेगा।
    चार, 50 रुपए से ऊपर के सारे नोट खत्म कर दिए जाएंगे।
    पांच, सरकार कैश लेन-देन की ऊपरी सीमा (मान लेते हैं 2000 रुपए) निर्धारित कर देगी। इसका मतलब यह होगा कि इससे ऊपर के कैश लेन-देन को कानूनी संरक्षण हासिल नहीं होगा।

    टैक्स माफी
    मौजूदा समय में देश में तरह-तरह के जो तमाम टैक्स लिए जा रहे हैं, उन सबको मिलाकर सरकार जो पूरा राजस्व वसूल करती है वह वित्तीय वर्ष 2011-12 के बजट के मुताबिक करीब 11 लाख करोड़ रुपए बैठते हैं। तीन लाख करोड़ रुपए सरकार ने अन्य उपायों से जुटाने की बात कही है। कुल करीब 15 लाख करोड़ रुपए का बजट वित्त मंत्री ने इस बार पेश किया है। अब अगर पहले कदम के रूप में ये सारे टैक्स माफ कर दिए जाएं और इसी के साथ उठाए जाने वाले दूसरे कदम के रूप में 2 फीसदी का बैंक ट्रांजैक्शन टैक्स लगा दिया जाए तो क्या होगा?

    बैंक ट्रांजैक्शन टैक्स – 2 फीसदी
    बैंकों में मुख्यतया 5-6 तरह के ट्रांजैक्शन होते हैं। इनमें से अगर सिर्फ एक ट्रांजैक्शन RTGS (रियल टाइम ग्रॉस सेटलमेंट) को लिया जाए तो देश के तमाम बैंकों को मिलाकर रोज औसतन करीब 2,70,000 करोड़ रुपए की रकम बैठती है। कैलकुलेशन की आसानी के लिए इस रकम को 2,50,000 करोड़ रुपए मान लेते हैं। इसका 2% हुआ 5000 करोड़ रुपए। अब साल के 365 दिन में से महज 300 दिनों का हिसाब लें तो सरकार के राजस्व में 15 लाख करोड़ रुपए आ जाते हैं। यानी बजट की सारी जरूरतें पूरी। अन्य उपायों से पैसे जुटाने की भी जरूरत नहीं दिख रही।

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    बीटीटी का बंटवारा
    इस बैंक ट्रांजैक्शन पर लगने वाले टैक्स से जो रकम आएगी उसका बंटवारा केंद्र सरकार (0.7%), राज्य सरकार (0.6%) और स्थानीय प्रशासन (0.35%) में किया जा सकता है। चूंकि इसमें बैंकों की जिम्मेदारी और उनका बोझ बढऩे वाला है, इसलिए उन्हें भी इस राजस्व का एक हिस्सा (0.35%) दिया जाएगा।

    कैशलेस इकॉनमी की ओर
    इन कदमों का पूरा फायदा तभी मिलेगा जब इसके साथ ही सरकार बड़े नोटों (मान लें 50 रुपए से ऊपर के सभी नोट) पर पूरी तरह बैन लगा दे। इससे एक तो फर्जी नोटों की बड़ी समस्या से छुटकारा मिल जाएगा और दूसरे सारे काम इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग के जरिए (यानी क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड वगैरह से) होने लगेंगे। सरकार कैश में कारोबार या लेन-देन की ऊपरी सीमा (मान लें 2000 रुपए) निर्धारित कर देगी। उसके बाद कैश में काम करने की जरूरत और इच्छा दोनों कम होती जाएगी।

    इससे फायदे
    समूचा काला धन वाइट होकर इकॉनमी में शामिल हो जाएगा जिससे इकॉनमी को जबर्दस्त ताकत मिलेगी। बिजनेस कम्यूनिटी के लिए सीधे-सादे ढंग से बिजनेस करना आसान हो जाएगा। वेतनभोगी वर्ग को इनकम टैक्स जैसे झंझटों से तो राहत मिलेगी ही, चीजों के दाम अप्रत्याशित रूप से कम हो जाएंगे। इन कदमों से बैंकिंग का इतना विस्तार होगा कि जल्द ही देश का लगभग हर नागरिक इसके दायरे में आ जाएगा। चूंकि हर शख्स का अपना अकाउंट होगा जिसमें उसके ट्रांजैक्शन डीटेल्स होंगे, इसलिए हर शख्स की अपनी साख होगी जिसके आधार पर उसे लोन वगैरह मुहैया कराना आसान होगा।

    सबसे बड़ी बात यह कि चूंकि हर ट्रांजैक्शन वाइट में होगा, उसमें 100% पारदर्शिता होगी, इसलिए आतंकवाद से लेकर सामान्य अपराध तक – सबका नियंत्रण आसान हो जाएगा।

    यह प्रस्ताव आपके लिए कितना फायदेमंद होगा, यह जानने का एक आसान तरीका है। आप अपनी सारी आय और सारे खर्च का एक अंदाजा निकाल लें और इसकी 2% राशि क्या होगी, यह पता कर लें। यह आपका अधिकतम टैक्स होगा। (नोट करें खर्च पर अलग से कोई टॅक्स नही है फिर भी जिन चीज़ों पर आप खर्च करेंगे उनकी कीमतों मे 2 % टॅक्स जुड़ा होगा जो संभवतः आप ही को देना होगा बतौर कस्टमर. इसलिए कहा गया है की यह अधिकतम संभव टॅक्स होगा आप पर)

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    अब आप यह देखें कि अभी आप कितना टैक्स दे रहे हैं। आपको पता चल जाएगा कि आपको कितना फायदा हो रहा है। यदि आप सैलरीड एंप्लॉयी हैं तो आपके लिए यह हिसाब करना और आसान है। अपने खाते में क्रेडिट होने वाली सारी रकम का जोड़ देख लें। उसका 2% निकाल लें। फिर यह अंदाजा लगएं कि आप जितना कमाते हैं, उसका कितना खर्च करेंगे। उसके लिए और 2% निकाल लें। यह आपका अधिकतम टैक्स होगा। इसकी तुलना उस रकम से करें जो आप इनकम टैक्स के तौर पर देते हैं। इसके अलावा आप जो कुछ भी खरीदते हैं, उसपर वैट और सर्विस टैक्स के नाम पर अलग रकम देते हैं जिसे आप कैलकुलेट नहीं कर सकते। मेरा मानना है कि रकम आपके इनकम टैक्स से भी काफी कम होगी।

    समझ की आसानी के लिए एक उदाहरण लेते हैं। आज की तारीख में कोई व्यक्ति सालाना 10 लाख रुपए कमाता है तो बिना किसी छूट के उसका 1,33,900 रुपए तक का इनकम टैक्स बनता है और होम लोन के इंटरेस्ट और इनवेस्टमेंट पर मैक्सिमम छूट मिले तो टैक्स की रकम बनती है 82,400 रुपए। अगर वह अपनी आय की आधी रकम भी खर्च करता है और उस पर 12% का वैट और सर्विस टैक्स देता है तो वह रकम बनती है 60 हजार। यानी कुल टैक्स हुआ अधिकतम 1,93,900 रुपए का और न्यूनतम 1,42,400 रुपए।

    अब नए सिस्टम में देखें क्या होता है। 10 लाख (आय) पर 2% टैक्स हुआ 20 हजार और 5 लाख (खर्च) पर 2% टैक्स हुआ 10 हजार। यानी केवल 30 हजार। यानी कहां वह आज के सिस्टम में 1.93 लाख से लेकर 1.42 लाख टैक्स देता है और कहां वह नए सिस्टम में 30 हजार टैक्स देगा। है न फायदे का सौदा? और सबसे बड़ी बात – आपको टैक्स कम देना होगा लेकिन सरकार की आमदनी कम नहीं होगी।

    मेरा मानना है कि यह प्रस्ताव बहुत ही काम का है। पहली नजर में ये बातें मुझे तर्कसंगत ही नहीं, व्यावहारिक भी लगीं। मैं इसमें कोई ऐसी खोट नहीं खोज पाया जिसके सहारे इसे खारिज करूं। आप जरूर कोशिश करें। आपकी कोशिश इस प्रयास को बेहतर बनाने में तो मदद करेगी ही, आपको 5 करोड़ रुपए का इनाम भी दिला सकती है। जी हां, अर्थ क्रांति ट्रस्ट ने उस शख्स को 5 करोड़ रुपए इनाम देने का ऐलान कर रखा है जो अर्थशास्त्रीय पैमानों पर इस प्रस्ताव को गलत साबित कर देगा।

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