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portable bio gas plant
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हिसार। हिसार से 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है

गांव मीरकां। यहां कई परिवार सालों से गोबर से बायोगैस प्लांट चला रहे हैं। पारपंरिक गैस प्लांट में गैस बनाने के लिए ये गोबर का इस्तेमाल करते हैं घरेलू गैस सिलेंडर का इस्तेमाल यहां ना के बराबर है। इसी तरह भिवानी जिले में बाढड़ा से 22 किलोमीटर दूर गांव है दगड़ौली। यहां खेतों में ढाणी बनाकर रहते हैं किसान जगमाल आर्य।

दो साल साल पहले तक ये घरेलू गैस का सिलेंडर भरवाने के लिए बाढड़ा के कई कई चक्कर लगाते थे। अब पूछो तो कहते हैं- हमारे हिस्से के सिलेंडर जरूरतमंदों को दे दो, हमें उनकी जरूरत नहीं है। जगमाल आर्य के हौसले का कारण है, इनके घर से निकलने वाला कूड़ा। करीब 9 हजार की लागत से ये अपने घर में डोमेस्टिक बायोगैस प्लांट लगाकर गैस की जरूरत पूरी कर रहे हैं। गैस के साथ ही कंपोस्ट भी निकलती है और उससे उगाते हैं ताजी सब्जियां। जगमाल आर्य इस क्षेत्र में प्लांट लगाने वाले पहले व्यक्ति थे लेकिन अब संख्या 100 के करीब हो गई है।

आठ लोगों का परिवार बड़े मजे से घर के कूड़े से बनी गैस पर खाना पकाने सहित रसोई के सारे काम करता है। पहले घरेलू गैस खत्म होने पर चूल्हा जलाना पड़ता था लेकिन अब दो साल से यह नौबत नहीं आई। दगड़ौली के पास ही गांव है बेरला। मास्टर रणबीर के लिए सिलेंडर रीफिल करवाना किसी आफत से कम नहीं था। डेढ़ साल पहले जगमाल आर्य का प्लांट देखकर खुद भी प्लांट लगा लिया। अब यहां भी एलपीजी की जरूरत नहीं क्योंकि घर के कूड़े से मिथेन जो निकलती है। साथ ही मिलती है उपयोगी कंपोस्ट खाद। अब भिवानी जिले में सैकड़ों लोग प्लांट लगाकर गैस बना रहे हैं और गैस की कीमतों में बढ़ोतरी की बात से इनके चेहरे की मुस्कान पर कोई असर नहीं पड़ता।

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यह है डोमेस्टिक बायोगैस प्लांट

बायोगैस प्लांट रबर की सीट से बना है। यह सीट चार फुट जमीन में दबाई जाती है और चार फुट ऊपर गैस के लिए रखी जाती है। इसमें एक इनलेट कूड़ा कर्कट डालने के लिए बना होता है और दूसरा कंपोस्ट बाहर निकालने के लिए। गैस को एक पाइप के जरिए रसोई तक पहुंचाया जाता है। इसके बाद इनलेट में रोज तीन किलो सब्जियों के छिलके, कूड़ा कर्कट और गोबर आदि के साथ पानी डाला जाता है। तीन चार दिन में गैस बननी शुरू हो जाती है। करीब पांच किलो वेस्ट मेटिरियल से रोज 1 से सवा किलोग्राम गैस बनाता है और आम घर की आसानी से पूरी हो जाती है। प्लांट लगाने पर खर्च आता है 9 हजार रुपए।

इनके लिए भी उपयोगी

डोमेस्टिक बायोगैस प्लांट ढाबों, होटलों, मुर्गी, पिग, पशु फार्म और अस्पतालों के लिए भी बेहद उपयोगी है। लोहानी में बाबा योगी नेता नाथ अस्पताल में भी 3 क्यूबिक मीटर का प्लांट लगाया गया है। यहां केंटीन में पहले हर दूसरे तीसरे दिन सिलेंडर की जरूरत पड़ती थी लेकिन अब यह सिलसिला टूट चुका है। केंटीन की थालियों में बचा खाना, सब्जियों के छिलके और मरीजों द्वारा घर से आया बचा हुआ खाना अब इस प्लांट की खुराक बन रहा है। यहां केंटीन में दो चूल्हे नॉन स्टॉप दिनभर बायोगैस से चलते रहते हैं और मरीज भी अपना खाना इन्हीं पर गर्म कर खाते हैं। कंपोस्ट अस्पताल के पौधों में डाली जाती है।

और चल निकला बायोगैस का दौर

स्वच्छता के लिए काम करने वाले भिवानी के प्रोजेक्ट ऑफिसर मनोज जैन को नेट पर एक दिन डोमेस्टिक बायोगैस प्लांट की जानकारी हाथ लगी। डिटेल में गए तो पाया कि इससे न केवल गैस की जरूरत पूरी हो सकती है बल्कि यह अक्षय ऊर्जा और स्वच्छता में भी एक बड़ा कदम साबित होगा। उन्होंने चेन्नई की एक एजेंसी से उसका पोर्टेबल बायोगैस प्लांट ऑर्डर किया। नवंबर 2009 में पहला प्लांट दगड़ौली के जगमाल आर्य के यहां लगा और उसके बाद तो लगाने वालों का तांता ही लगा हुआ है। अब जल्द ही वे किचन बायोगैस प्लांट लेकर आने वाले हैं। यह वाशिंग मशीन जितनी जगह ही घेरेगा और किचन में ही रखा जा सकेगा।

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