Marshal Art Father मार्शल आर्ट के जनक एक भारतीय Bodhidharman बोधिधार्मन

Marshal Art Father मार्शल आर्ट के जनक एक भारतीय Bodhidharman बोधिधार्मन

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आज हम अपनी सभ्यता और संस्कृति को पूर्ण रूप से भूल चुके हैं | जिस संस्कृति को हम लोग भूल रहे हैं और जिन मूल्यों को हम को चुके हैं उनको अपनाकर अनेकों देश आज विकसित अवस्था में हैं और हम क्या हैं आप समझ रहे होंगे | आज जिस मार्शल आर्ट की कला को हम सीखने के लिए लालायित रहते हैं उसके बारे में हम यही सोचते हैं की यह तो चीन की देन है, जबकि हकीक़त इसके उल्टे है | इस कला का ज्ञान चीन ने नहीं बल्कि चीन के साथ पूरे विश्व को हमने दिया था | लेकिन विडम्बना यह है की इस विद्या के जन्मदाता का नाम ही हमने आज तक नहीं सुना |

पश्चिम और दुनिया के अन्य देशों में मार्शल आर्ट को चर्चित करने का श्रेय काफी हद तक स्वर्गीय ब्रूस ली को दिया जाता है। बाद में 1960 और 1970 के दशक में मार्शल कलाकार और हॉलीवुड अभिनेता ब्रूस ली से प्रभावित मीडिया की दिलचस्पी मार्शल आर्ट के प्रति देखी गई । एशियाई और हॉलीवुड मार्शल आर्ट फिल्मोंको भी आंशिक रूप से इसका श्रेय दिया जाता हैं जहां जैकी चेन और जेट ली जैसे प्रख्यात फिल्मी हस्तियों को हाल के वर्षों में चीनी मार्शल आर्ट को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार माना जाता है।

मार्शल आर्ट में सबसे अच्छी विद्या मानी जाती है कुंग्फु और इसको सिखाने का सबसे अच्छा विद्यालय माना जाता है चीन में स्थित सओलिन मन्दिर | आपको यह जानकार बेहद आश्चर्य होगा की इस विद्यालय की आधारशिला रखने वाले और चीन को इस कला का ज्ञान देने वाले भारतीय थे | उस भारतीय का नाम था – ” बोधिधर्मन ” |

550 ई.पू. दक्षिण भारत के पल्लव वंश के राजकुमार, बोधिधर्मन (जिन्हे धरुमा नाम से भी पुकारा गया) नाम के भिक्षु बन गये। बोधिधर्मन आत्मरक्षा कला के अलावा एक महान चिकित्सक भी थे | उन्होंने अपने ग्रन्थ में डीएनए के माध्यम से बीमारियों को ठीक करने की विधि के बारे में भी आज से १६०० साल पहले बता दिया था | बोधिधर्मन के माध्यम से ही चीन, जापान और कोरिया में बौद्ध धर्म का विस्तार हुआ था। 520-526 ईश्वी में चीन जाकर उन्होंने चीन में ध्यान संप्रदाय की नींव रखी थी जिसे च्यान या झेन कहते हैं। 

माना जाता है कि यह भिक्षु दक्षिण भारत के कांचीपुरम के राजा सुगंध के तीसरे पुत्र थे। बौद्ध धर्म के ज्ञान को भगवान बुद्ध ने महाकश्यप से कहा। महाकश्यप ने आनंद से और इस तरह यह ज्ञान चलकर आगे बोधिधर्मन तक आया। बोधिधर्मन उक्त ज्ञान व गुरु शिष्य परंपरा के अट्ठाइसवें गुरु थे।

उत्तरी चीन के तत्कालीन राजा बू-ति बोधिधर्मन से प्रभावित थे। बू-ति के निमन्त्रण पर बोधिधर्मन की उनसे नान-किंग में भेंट हुई। यहीं पर नौ वर्ष तक रहते हुए बोधिधर्मन ने ध्यान का प्रचार-प्रसार किया। माना जाता है कि बोधिधर्म जब तक चीन में रहे मौन ही रहे और मौन रहकर ही उन्होंने ध्यान-सम्प्रदाय की स्थापना कर ध्यान के रहस्य को बताया। बाद में उन्होंने कुछ योग्य व्यक्तियों को चुना और अपने मन से उनके मन को बिना कुछ बोले शिक्षित किया। इसे हम मानसिक संवाद कह सकते हैं | यही ध्यान-सम्प्रदाय कोरिया और जापान में जाकर विकसित हुआ।

बोधिधर्मन के प्रथम शिष्य और उत्तराधिकारी का नाम शैन-क्कंग था, जिसे शिष्य बनने के बाद उन्होंने हुई-के नाम दिया। पहले वह कन्फ्यूशस मत का अनुयायी था। बोधिधर्मन की कीर्ति सुनकर वह उनका शिष्य बनने के लिए आया था। बोधिधर्म का कोई ग्रंथ नहीं है, लेकिन ध्यान सम्प्रदाय की इतिहास पुस्तकों में उनके कुछ वचनों का उल्लेख मिलता है। 

मार्शल आर्ट या लड़ाई की कलाएं विधिबद्ध अभ्यास की प्रणाली और बचाव के लिए प्रशिक्षण की परंपराएं हैं। सभी मार्शल आर्ट्स का एक समान उद्देश्य है : ख़ुद की या दूसरों की किसी शारीरिक ख़तरे से रक्षा. इसके अलावा कुछ मार्शल आर्ट को जहां आस्था जैसे हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म, दाओवाद,कन्फ्यूशीवाद या शिन्टो से जोड़ा जाता है, वहीं दूसरी सम्मान के एक विशेष नियम का पालन करती हैं। मार्शल आर्ट को विज्ञान और कला दोनों माना जाता है। इनमें से कई कलाओं का प्रतिस्पर्धात्मक अभ्यास भी किया जाता है, ज़्यादातर लड़ाई के खेल में, लेकिन ये नृत्य का रूप भी ले सकती हैं।

मार्शल के गुण अनुशासन, विनम्रता, संयम और सम्मान इसी दर्शन शास्त्री की देन माने जाते हैं। दारुमा को चीन में ज़ैनबौद्धवाद के संस्थापक के रूप में भी जाना जाता है। इसीलिए नैतिक आचरण और आत्मानुशासन पुरातन काल से ही मार्शल अभ्यास का हिस्सा बन गये। इसी के साथ भारतीय ध्यान गुरू बुद्धभद्र (मैंडेरिन में इसे बाटुओ बुलाया जाता है) चीन के शाओलिन मंदिर के पहले महंत बने ! उत्तरी वी राजवंश के राजा झीआओवेन ने 477 ई. पू. शाओलिन मठ का निर्माण करवाया.“इसी विषय पर हाल ही में इक फिल्म भी आई थी देखि हो शायद आपने चेन्नई V / s चाईना …!

आज भी केरल में मार्शल आर्ट के इस कौशल को इसके मूल स्वरुप में देखा जा सकता है |

मार्शल आर्ट के जनक एक भारतीय हैं ” हमारी संस्कृति हमारी सोच मार्शल आर्ट में सबसे अच्छी विद्या मानी जाती है कुंग्फु और इसको सिखाने का सबसे अच्छा विद्यालय माना जाता है चीन में स्थित सओलिन मन्दिर | आपको यह जानकार बेहद आश्चर्य होगा की इस विद्यालय की आधारशिला रखने वाले और चीन को इस कला का ज्ञान देने वाले भारतीय थे | उस भारतीय का नाम था – ” बोधिधर्मन ” | 
((अधिक जानकारी के लिए तमिल चलचित्र #7aamarivu देखें )) पल्लव साम्राज्य के शासक बल्लव महाराज के तीसरे राजकुमार बोधिधर्मन | बोधिधर्मन आत्मरक्षा कला के अलावा एक महान चिकित्सक भी थे | उन्होंने अपने ग्रन्थ में डीएनए के माध्यम से बीमारियों को ठीक करने की विधि के बारे में भी आज से १६०० साल पहले बता दिया था | आज हम अपनी सभ्यता और संस्कृति को पूर्ण रूप से भूल चुके हैं | 
जिस संस्कृति को हम लोग भूल रहे हैं और जिन मूल्यों को हम को चुके हैं उनको अपनाकर अनेकों देश आज विकसित अवस्था में हैं और हम क्या हैं आप समझ रहे होंगे | 
आज जिस मार्शल आर्ट की कला को हम सीखने के लिए लालायित रहते हैं उसके बारे में हम यही सोचते हैं की यह तो चीन की देन है .. जबकि हकीक़त इसके उल्टे है | इस कला का ज्ञान चीन ने नहीं बल्कि चीन के साथ पूरे विश्व को हमने दिया था | लेकिन विडम्बना यह है की इस विद्या के जन्मदाता का नाम ही हमने आज तक नहीं सुना | यह सब मैकाले की शिक्षा नीति का ही प्रतिफल है | आज जिसे चीन, जापान, थाईलैंड आदि देशों में जिसे भगवन की तरह पूजा जाता है ; वह हमारे देश के हैं और हम उनका नाम भी नहीं जानते हैं, इससे बड़ी शर्म की बात क्या हो सकती है | 

आज आवश्यकता है हमें अपने गौरवमय इतिहास को जानने की, जो भी प्राचीन ग्रन्थ हैं उनका अध्ययन करने की, जो भी ज्ञान हमारे हमारे ऋषि – मुनियों ने हमें प्रदान किया हुआ है उस पर अमल करने की | इस पोस्ट को पड़ने के बाद कई ‘ अंग्रेजो के तलवे चाटने ‘ और ” भारत ने दिया ही क्या है ? ” कहने वालों के पेट में दर्द होना शुरू हो जायेगा .. इन जोकरों से अनुरोध है की पहले गूगल पर जाकर जानकारी प्राप्त कर लें फिर कमेंट करें | धन्यवाद् “ भारतीय संस्कृति ही सर्वश्रेष्ट संस्कृति है |”
कई बार हमें शाओलिन मॉन्क से जुड़ी ऐसी खबरें पढ़ने को मिलती हैं जिनके बारे में जानकर हैरत होती है। कोई शाओलिन मॉन्क पानी पर दौड़ लगाता है तो कोई कड़ाही में खौलते पानी में बैठ जाता है, इसके बावजूद उसे कुछ नहीं होता है। दरअसल, ये एक आर्ट है जिस वजह से शाओलिन भिक्षु ऐसा कर गुजरते हैं।
क्या आप जानते हैं कि ये कला चीन और जापान जैसे देशों में कहां से आई? बता दें कि एक भारतीय शख्स ने इस कला को दुनिया के कई देशों में फैलाया था। इस शख्स का नाम बोधिधर्मन था। ऐतिहासिक तथ्यों की मानें तो इन्होंने ही चीन-जापान के लोगों को मार्शल आर्ट सिखाई थी, जिस पर आज वे पूरी दुनिया में इतराते हैं।
कौन थे बोधिधर्मन
आखिर ये बोधिधर्मन कौन थे? बता दें कि बोधिधर्मन मार्शल आर्ट और आयुर्वेद चिकित्सा के जानकार थे। इनका जन्म दक्षिण भारत में पल्लव राज परिवार में हुआ था। वह कांचीपुरम के राजा के पुत्र थे, लेकिन छोटी आयु में ही उन्होंने राज्य छोड़ दिया और भिक्षुक बन गए। इसी क्रम में वे चीन पहुंचे, जहां उन्होंने लोगों की रक्षा की और उन्हें महामारी से भी बचाया। चीन के लोगों ने मार्शल आर्ट और आयुर्वेद चिकित्सा सीखने की इच्छा जाहिर की, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया।
भारत में अमूमन ज्यादातर लोगों को बोधिधर्मन के बारे में कोई भी जानकारी नहीं है। लेकिन चीन में अधिकतर लोगों को बोधिधर्मन के बारे में पता है। वहां पर इन्हें धामू के नाम से भी जाना जाता है। इतना ही नहीं, शाओलिन टेंपल में इनकी मूर्तियां स्थापित हैं और लोग इन्हें पूजते हैं।
बन चुकी है फिल्म
दक्षिण भारतीय भाषा में बोधिधर्मन के पर फिल्म भी बन चुकी है। इस फिल्म में दिखाया गया है कि अपनी मां की इच्छा के अनुसार बोधिधर्मन चीन पहुंचते हैं। वहां पर लोगों को आत्मरक्षा और चिकित्सा की जानकारी देते हैं। हालांकि, अंत में जब वे अपने देश लौटने की इच्छा जाहिर करते हैं, तो वहां के विद्वान यह आशंका व्यक्त करते हैं कि उनके जाने से महामारी फिर से आ सकती है। इसके बाद वहां के लोगों ने उन्हें खाने में जहर दे दिया। हालांकि, बोधिधर्मन को इसका पता चल गया था, इसके बावजूद उन्होंने जहरीला भोजन ग्रहण कर लिया। इस फिल्म में सुपरस्टार सूर्या ने बोधिधर्मन की भूमिका निभाई थी।
कलारिपयात्तु की देन है मार्शल आर्ट
वर्तमान के मार्शल आर्ट चाहे वो कुंग फू हो या वुशु या फिर ताइक्वांडो और कराटे, ये सब प्राचीन भारतीय आत्मरक्षा शैली कलारिपयात्तु की देन हैं। आज भी दक्षिण भारत में लोग इस कला को सीखते हैं। बॉलीवुड एक्टर विद्युत जामवाल भी इस कला में एक्सपर्ट हैं।
पश्चिम और दुनिया के अन्य देशों में मार्शल आर्ट को चर्चित करने का श्रेय काफी हद तक स्वर्गीय ब्रूस ली को दिया जाता है। बाद में 1960 और 1970 के दशक में मार्शल कलाकार और हॉलीवुड अभिनेता ब्रूस ली से प्रभावित मीडिया की दिलचस्पी मार्शल आर्ट के प्रति देखी गई । एशियाई और हॉलीवुड मार्शल आर्ट फिल्मोंको भी आंशिक रूप से इसका श्रेय दिया जाता हैं जहां जैकी चेन और ब्रूस ली जैसे प्रख्यात फिल्मी हस्तियों को हाल के वर्षों में चीनी मार्शल आर्ट को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार माना जाता है।
मार्शल के गुण अनुशासन, विनम्रता, संयम और सम्मान इसी दर्शन शास्त्री की देन माने जाते हैं। दारुमा को चीन में ज़ैनबौद्धवाद के संस्थापक के रूप में भी जाना जाता है। इसीलिए नैतिक आचरण और आत्मानुशासन पुरातन काल से ही मार्शल अभ्यास का हिस्सा बन गये। इसी के साथ भारतीय ध्यान गुरू बुद्धभद्र (मैंडेरिन में इसे बाटुओ बुलाया जाता है) चीन के शाओलिन मंदिर के पहले महंत बने ! उत्तरी वी राजवंश के राजा झीआओवेन ने 477 ई. पू. शाओलिन मठ का निर्माण करवाया.आज भी केरल में मार्शल आर्ट के इस कौशल को इसके मूल स्वरुप में देखा जा सकता है |
इसी विषय पर कुछ समय पूर्व एक  फिल्म भी आई थी  आपने चेन्नई V / s चाईना  http://www.dailymotion.com/video/x2jvzwo

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