मैक्समूलर द्वारा वेदों का विकृतिकरण

मैक्समूलर द्वारा वेदों का विकृतिकरण

1223
0
SHARE
भारत के लोगों को फ्रेडरिक मैक्समूलर का परिचय कराने की आवश्यकता नहीं हैं क्योंकि ब्रिटिश शासनकाल में ब्रिटिश राजनीतिज्ञों, प्रशासकों और कूटनीतिज्ञों ने उसे एक सदी (१८४६-१९४७) तक लगातार हिन्दुओं का एक अभिन्न मित्र और वेदों के महान विद्वान के रूप में प्रस्तुत किया है, परन्तु सत्य इसके विपरीत है। वास्तव में वह हिन्दुओं और हिन्दू धर्मशास्त्रों का एक महान शत्रु था। लेकिन दुर्भाग्य से, उस समय के ही नहीं, बल्कि आज के हिन्दू भी उसके उद्‌देश्य व कार्य के दूरगामी प्रभाव को समझने में असफल रहे हैं क्योंकि मैक्समूलर ने अपनी लेखनी की चतुराई द्वारा अपने वास्तविक स्वरूप और वेद भाष्य के विकृतीकरण के उद्‌देश्य को बड़े योजनाबद्ध तरीके से छिपाए रखा, यहाँ तक कि उसके निधन के बाद सन्‌ १९०१ में प्रकाशित स्वलिखित जीवनी में भी उसे उजागर नहीं किया।

उन्नीसवी सदी के हिन्दू, मैक्समूलर और उसके मैक्समूलरवाद को पहचानने और समझने में पूरी तरह असफल रहे हैं क्योंकि हिन्दुओं के आमतौर पर अत्यंत सीधे-सादे होने के कारण उन्होंने उसे ही सच मान लिया जो कि मैक्समूलर ने कहा और लिखा। इसके अतिरिक्त उसे आजीवन अप्रत्यक्ष रूप् से अंग्रेजों का पूर्ण समर्थन और सहयोग मिलता रहा जो कि उस समय भारत के शासक थे। इसी कारण वह भाषा विज्ञान-शोध की आड़ में छिपकर लगातार हिन्दू धर्म एवं वेदों पर प्रहार करता रहा।” 
इसी के साथ-साथ अंग्रेज शासक लगातार यही प्रचार करते रहे कि मैक्समूलर तो वेदों का महान विद्वान और हिन्दू धर्म तथा हिन्दुआअें का शुभचिंतक है। वे इस कथन की पुष्टि इस बात से करते हैं कि उसने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में १८४६ से १९०० तक वेदों और हिन्दू धर्मशास्त्रों पर एक विशाल साहित्य स्वंय लिखा तथा अपने जैसे सहयोगी लेखकों द्वारा लिखवाकर उसे स्वयं संपादित किया।
इसलिए यहाँ हमारा उद्‌देश्य यह समझने का है कि क्या वह वास्तव में वेदों और हिन्दू धर्म शास्त्रों का प्रशंसक और भारत का मित्र था? क्या वह वेदों, उपनिषदों, दर्शनों आदि के उदात्त, प्रेरणादायक और आध्यात्मिक चिंतन से प्रभावित था, और उन्हें वह अंग्रेजी माध्यम से विश्वभर में फैलाना चाहता था? क्या वह भारतीय धर्मशास्त्रों का जिज्ञासु था? क्या उसने ऋग्वेद का भाष्य भारतीय प्राचनी यास्कीय-पाणिनीय पद्धति के अनुसार किया था? उसने सायण-भाष्य को ही आधार क्यों माना? क्या उसने सायण के सभी मापदण्डों को अपनाया? यदि नहीं, तो क्यो? आखिर उसे वेदों में क्या मिला?
क्या वह तुलनात्मकभाषा विज्ञान और गाथावाद के शोध की आड़ में एक पक्षपाती, पूर्वाग्रही और छद्‌मवेशी सैक्यूलर ईसाई मिशनरी था? जो वेदों और हिन्दू धर्म शास्त्रों के भ्रामक अर्थ करके हिन्दू धर्म को समूल नष्ट करना चाहता था। कया वह वेदों को बाईबिल से निचले स्तर का दिखाकर भारतीयों को ईसाईयत में धर्मान्तरित करना और भारत में ब्रिटिश राज को सुदृढ़ करना चाहता था? आखिर उसने वेदों और भारत के प्राचीन इतिहास के बारे में अनेक कपोल-कल्पित मान्यताएं क्यों स्थापित कीं? इसके अलावा ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी अंग्रेजी और संस्कृत दोनों ही भाषाओं के ज्ञान में अधकचरे, चौबीस वर्षीय, अनुभवहीन गैर-ब्रिटिश, जर्मन युवक मैक्समूलर को ही वेदभाष्य के लिए क्यों चुना?
उसने वेदों का विकृतीकरण क्या, क्यों और कैसे किया? इन्हीं कुछ प्रश्नों को यहाँ संक्षेप में विश्लेषण किया जाएगा ताकि अधकचरे ज्ञानी हिन्दू और सैक्यूलरवादी, जो उसके विकृत साहित्य के आधार पर समय-समय पर हिन्दू धर्म की निंदा करते रहते हैं, उसकी वास्तविकता तथा उसके निहित उद्‌देश्य को समझ सकें। इसके लिए हमें तत्कालीन ब्रिटिश शासित भारत की धार्मिक व राजनैतिक स्थितियों कोसमझना होगा, जिनके कारण उन्हें एक मैक्समूलर की तलाश करनी पड़ी। 
पूरी पुस्तक ऊपर दिए लिंक से पढ़ी जा सकती है..
हम सिर्फ मुख्य बिंदु hi प्रस्तुत कर रहे हैं..
https://www.youtube.com/watch?v=AndnzW7mNgk  भाई राजीव दीक्षित जी द्वारा मैक्स मूलर की सच्चाई 

मैकाले का भारत के प्राचीन संस्कृत साहित्य के प्रति इतना घृणात्मक भाव होना अस्वाभाविकनहीं है क्योंकि पराधीनों की संस्कृति विजेताओं से श्रेष्ठतर कैसे हो सकती है, विशेषकर जब उन्हें उन रा राज करना हो? अतः उसने आगे कहाः
“……I have traveled across the length and breadth of India and I have not seen one person who is a beggar, who is a thief.  Such wealth I have seen in this country, such high moral values, people of such caliber, that I do not think we would ever conquer this country unless we break the very backbone of this nation which is her spiritual and cultural heritage and therefore.  I propose that we replace the old and ancient education system, her culture, for if the Indians think that all that is foreign, and English is good and greater than there own, they will loose their own self esteem their nature culture and they will become what we want them a truly dominated nation.” 
(2  Feb. 1835 Proc. On education).
अर्थात्‌ ”मैंने सारे भारत का भ्रमण किया है और मैंने एक ीाी आदमी को चोर और क भी को भिखारी नहीं पाया है। मैंने इस देश में इतनी सम्पदा देखी है तथा इतने उच्चनैतिक आदर्श देखें हैं और इतने उच्च योग्यता वाले लोग देखें हैं कि मैं नहीं समझता कि हम कभी इसे जीत पाऐंगे जब तक कि इसके मूल आधार को ही नष्ट न कर दें जो कि इस देश की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक धरोहर है; और इसीलिए मैं प्रस्तावित करता हूँ कि हम उसकी प्राचीन और पुरानी शिक्षा पद्धति और उकीस संस्कृति को बदल दें क्यों यदि भारतीय यह सोचने लगें कि जो कुछ विदेशी और अंग्रेजी है, वह उनकी अपनी संस्कृति से अच्छा और उत्तमतर है तो वे अपना स्वाभिमान एवं भारतीय संस्कृति को खो देंगे और वे वैसे ही हो जावेंगे जैसाकि हम चाहते हैं, पूरी तरह एक पराधीन राष्ट्र।”
 (२ फरवरी १८३५, प्रोसी, शिक्षा)
”उसने सच्चाई से स्वीकारा भी कि भारत में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की स्थापना का उद्‌देश्य वास्तव में, ऊँची जातियों के हिन्दुओं को ईसाईयत में धर्मान्तरित करने का था और ऐसा ही उसने कलकत्ता से, १२ अक्टूबर १८३६ को, अपने पिता को एक पत्र में लिखा भी थाः
“Our English schools are flourishing wonderfully.  We find it difficult,–indeed, in some places impossible,– to provide instructions for all who want it.  At the single town of Hoogly fourteen hundred boys are learning English.  The effect of this education on the Hindoos is prodigious.  No Hindoos, who has received an English education, ever remains sincerely attached in his religion. Some continue to profess it as a matter of policy; but many profess themselves pure Deists, and some embrace Christianity.  It is my firm belief that if, our plans of education are followed up, there will not be a single idoiater among the respectable classes in Bengal thrity years hence.  And this will be effectetd without any efforts to proselytise; without the smallest interference with religious liberty; merely by the natural operation of knowledge and reflection.  I heartily rejoice in the prospects…”
Within half a year after the time when you read this we shall be making arrangements for our return…… I feel as if I never could be unhappy in my own country; as if so exist on English ground and among English people, seeing the old familiar sights and hearing the sound of my mother tongue, would be enough for me…… Ever Yours Most Affectionately, T.B. Macaulay.” 
(Life and Letters of Lord Macaulay. Pp. 329-30; Bharti, pp. 46-47).
अर्थात्‌ ”हमारे अंग्रेजी स्कूल आश्चर्यजनक गति से बढ़ हे हैं। निसंदेह कुछ जगहों पर ऐसा होना मुश्किल होरहा है, कुछ जगहों पर हमें उन सबकों शिक्षा दे पाना असंभव हो रहा है जो कि ऐसा चाहते हैं। हुगली शहर में चौदह सौं लड़के अंग्रेजी सीख रहे हैं। इस शिक्षा का हिन्दुओं पर आश्चर्यजनक प्रभाव पड़ रहा है। कोई भी हिन्दू जिसने अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त कर ली है, वह निष्ठापूर्वक हिन्दू धर्म से जुड़ा हुआ नहीं रहता है। कुछ एक, औपचारिकता के रूप में, नाम मात्र को हिन्दू धर्म से जुड़े दिखाई देते हैं। लेकिन अनेक स्वयं को ‘शुद्ध देववादी’ कहते हैं तथा कुछ ईसाईमत अपना लेते हैं। यह मेरा पूरा विश्वास है यदि हमारी शिक्षा की योजनाएँ चलती रहीं तो तीस साल बाद बंगाल के सम्भ्रान्त परिवारों में एक भी मूर्तिपूजक नहीं रहेगा और ऐसा किसी प्रकार के प्रचार एवं धर्मान्तरण किए बगैर हो सकेगा। किसी धार्मिक आजादी में न्यूनतम हस्तक्षेप न करते हुए ऐसा हो सकेगा। ऐसा स्वाभाविक ज्ञानदेने की प्रक्रिया द्वारा हो जाएगा। मैं हृदय से उस योजना के परिणामों से प्रसन्न हूँ।” आपका अत्यन्त प्रिय टी.बी. मैकॉले 
(लार्ड मैकॉले की जीवनी और पत्र, पृ. ३२९; भारती पृ. ४६-४७)
मैकॉले के विचारां की पुष्टि करते हुए ”पादरी क्लिफोर्ड ने ईमानदारी से यह स्वीकारा है………”
“Every Christian missionary will claim that the mission school in India has a definite purpose.  He may be specific and say that the funcgtion of mission schools in India is to lead boys and girls to lesus Christ.” 
(Christianity in a Changing India, p. 147).
अर्थात्‌ ”प्रत्येक ईसाई मिशनरी यह दावा करेगा कि भारत में मिशन स्कूलों का एक निश्चित उद्‌देश्य है। वह विशेषकर यह भी कह सकता है कि भारत में मिशन स्कूलों का कार्य लड़के और लड़कियों को जीजस क्राइस्ट की ओर ले जाने का है।”
 (क्रिश्चियनिटी इन चैंजिंग इंडिया, पृ. १४७)

मैक्समूलर का दिसम्बर १८५५ में मैकॉले से मिलने संबंधी विवरण और उसके प्रभाव को उसने १८९८ में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘लैंग सायने’ में दिया है। भारती लिखते हैं कि इस मीटिंग में मैकॉले न केवल अधिकांश समय तक बोलता ही रहा बल्कि अन्त में उसने मैक्समूलर को इस ढंग से बिदा किया जो कि बड़ा बाध्यकारी भी थाऔर इस बात की और भी ज्यादा सम्भावना है कि मैकॉले ने संस्कृत प्रेमी जर्मन विद्वान मैक्समूलर को अपने स्वाभाविक तिरस्कारपूर्ण हठ धर्मिता से उसके साथ व्यवहार किया हो। अपनी माँ को लिखे पत्र में मैक्समूलर ने इस बदनाम साक्षात्कार का वर्णन किया है। उसने दुखित मन से लिखाः
“Macaulay, and  I had a long conversation with him on the teaching necessary for the young men who are sent out to India. He is very clear headed, and extraordinarily eloquent……I went back to Oxford a sadder, and I hope, a wiser man.” 
(LLMM, Vol. 1, p. 162; Bharti, pp. 35-36).
इस बार मैं लंदन में मैकाले से मिला और उसके साथ इस विषय पर लम्बी बातचीत हुई कि भारत भेजे जाने वाले युवकों को क्या पढ़ाया जाने की आवश्यकता है। वह एक बहुत ही चालाक मस्तिष्क वाला वाक्‌पटृ व्यक्ति है…….. मैं और अधिक दुःखी होकर ऑक्सफोर्ड वापिस लौटा, और शायद, अधिक समझदार मनुष्य बनकर” 
(जी.प.खं. १, पृ. १६२)
मूलर के जीवनी लेखक निराद चौधरी का मत है कि ‘उसने मध्यम मार्ग अपनाया’, (वही. पृ. १३४), या यह कहिए कि उसने एक बहुरुपिया जैसा खेल खेला जिससेकि ब्रिटिशों के राजनैतिक उद्‌देश्यों की भी पूर्ति होती रह और भारतीयों को भी शब्द जाल में बहकाए रखा? मैक्समूलर एक अर्न्तमुखी व्यक्ति था जिसने ऋग्वेद के भाष्य करने के पीछे अपने सच्चे मनोभावों और उद्‌देश्यों को अपने जीवन भर कभी भी सार्वजनिक रूप से उजागर नहीं किया। मगर अपने हृदय की भावनाओं को १५ दिसम्बर १८६६ को केवल अपनी पत्नी को लिखे पत्र में अवश्य व्यक्त किया। उसके ये मनोभाव एवं उद्‌देश्य आम जनता को तभी पता चल सके जब उसके निधन के बाद, १९०२ में उसकी पत्नी जोर्जिना मैक्समूलर ने उसकी जीवनी व पत्रों को सम्पादित कर दो खण्डों में एक दूसरी जीवनी प्रकाशित की। यदि श्रीमती जोर्जिना उसे अप्रकाशित पत्रों को प्रकाशित न करती तो विश्व उस छद्‌मवेशी व्यक्ति के असली चेहरे को आज तक भी नहीं जान पाता। अपनी पत्नी को लिखे इस पत्र में मैक्समूलर ने अपने वेद भाष्य के उद्‌देश्य को पहली बार दिल खोलकर उजागर किया। वह लिखता हैः
“I hope I shall finish that work, and I feel convinced, though I shall not live to see it, that this edition of mine and the translation of the Veda will hereafter tell to a great extent on the fate of India, and on the growth of millions of souls in that country.  It is the root of their religion, and to show them what that root is, I feel sure, is the only way of uprooting all that has sprung up from it during the last three thousand years.”  
(LLMM. Vol, 1, p. 328).
अर्थात्‌ ”मुझे आशा है कि मैं इस काम को (सम्पादन-भाष्य आदि) पूरा कर दूंगा और मुझे निश्चय है कि यद्यपि मैं उसे देखने के लिए जीवित न रहूँगा तो भी मेरा ऋग्वेद का यह संस्करण और वेद का अनुवाद भारत के भाग्य और लाखों भारतीयों की आत्माओं के विकास पर प्रभाव डालने वाला होगा। यह (वेद) उनके धर्म का मूल है और मूल को उन्हें दिखा देना जो कुछ उससे पिछले तीन हजार वर्षों में निकला है, उसको मूल सहित उखाड़ फैंकने का सबसे उत्तम तरीका है।” 
(जी.प.,खं. १, ३२८)
उपरोक्त पत्र को पढ़ने के बाद पाठकों को और अधिक प्रमाणों की शायद आवश्यकता नहीं रहेगी। यहाँ मैक्समूलर स्वयं सच्चाई स्वीकारता है कि उसके वेद भाष्य का उद्‌देश्य क्या था। वह स्पष्ट कहता है कि उसके वेद और उससे निकले हिन्दू धर्म शास्त्रों के भाष्यादि का उद्‌देश्य हिन्दू धर्म को जड़ से उखाड़फैंकने का हैं भले ही वेदों में कितना ही श्रेष्ठ ज्ञान क्यों न हो। यदि वह इतना पक्षपाती और पूर्वाग्रही है, तो उसके साहित्य को पढ़ना और मानना ही व्यर्थ है।
इसका अर्थ यह भी हुआ कि जो कोई आज मैक्समूलर के वेद भाष्य को प्रामाणिक मानता है तथा वैसा प्रचार करता है, वह भी हिन्दू धर्म को जड़ से उखाड़ कर फैंक देना चाहता हूँ जैसा कि हम ईसाई मिशनरियों एवं कम्युनिष्टों के साहित्य व प्रचार कार्यों में देखते हैं।

उपरोक्त समर्पण पत्र में मैक्समूलर १८८२ में ‘ऋग्वेद’ और ‘सेक्रेड बुक्स ऑफ दी ईस्ट’ (अन्य धर्मों के ग्रंथों) केसम्पादन आदि के लिए अंग्रेजी के प्रति कृतज्ञता बार-बार प्रगट करता है।
”अंग्रेजों ने मैक्समूलर की व्यक्तिगत आवश्यकताओं की पूर्ति की; इसके बदले में मैक्समूलर ने अपनी आत्मा का ही बलिदान दिया।”
आत्म निरीक्षण का अवसर
हालांकि मैक्समूलर के निधन को आज १०९ वर्ष हो गए हैं और अंग्रेजों का राज्य भी भारत में समाप्त हो गया है। इस काल खंड में मैक्समूलर के सभी सिद्धान्तों की धज्जियाँ उड़ा दी गई हैं। परन्तु फिर भी केवल थोड़े से ही भारतीय मैक्समूलर के असली चेहरे को भली-भांति जानते होंगे। अधिकांश बुद्धिजीवी, जो उसके कार्यों से सुपरिचित होने का दावा करते हैं। वे अक्सर कही-सुनी अप्रामाणिक जानकारी पर दम्भ करते हैं जो कि सामान्यतया विरूपित होती है परन्तु हिन्दू विरोधी सेक्यूलरवादी आज भी योजनाबद्ध ढंग से उसे ही प्रचारित कर रहे हैं। परिणामस्वरूप वे जाने-अनजाने मित्र और शत्रु में भेद करने में असफल रहे हैं।
सच्चाई तो यह कि मैक्समूलर एक बहुरुपिये की तरह भारत और भारतीयों का सच्चा शुभचिन्तक बने रहने का ढोंगकरता रहा जबकि वास्तव में वह अपने नाम, दाम और ईसाईयत की खातिर जीवन भर वेदों और हिन्दू धर्मशास्त्रों को विकृतकरहिन्दुओं को ईसाईयत में धर्मान्तरित करने का प्रयास करता रहा जिसे कि ब्रिटिश राज्य का पूर्ण समर्थन मिला। खेद का विषय है कि उसके साहित्य को आज आजादी के बाद भी पहले ही की तरह समर्थन मिल रहा है, जा कि सर्वथा त्याज्य एवं निन्दनीय है।



मैक्समूलर बेनकाब
मैक्समूलर को ब्रिटिश योजनाओं और नीतियों के अनुसार नियुक्त किया गया और उसे यह काम सोंपा गया जिसे उसने पूरा करने के लिए अपने को सच्चाई के साथ बचन-बद्ध अनुभव किया। वह ईस्ट इंडिया कम्पनी के निदेशकों के बोर्ड को दिए गएइन वचनों के प्रति सच्चा सिद्ध करना चाहता था किवह वेदों के विकृतीकरण और भारत से हिन्दू धर्म की जड़ से उखाड़ने और उसकी जगह क्राइस्ट के धर्म-ईसाईयत को जमाने को पूरा प्रयास करेगा। उसने जीवन की अन्तिम घड़ी तक वेदों के निम्नीकरणअवनतिकरण एवं विकृतीकरणतथा उसकी जगह जीज़स क्राइस्ट और ईसाईयत को जमानेउसकी प्रशंसा करने और इन्हें प्रतिष्ठित करने के लिए सच्चाई के साथ जी-जान से प्रयास किया। यह एक दूसरी बात रही कि वह अपनी अभिलाषा पूरी करने में स्वयं भी पूरी तरह से बेनकाब हो गया।

 





Also Read:  जीवन दिशा

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY