मातृ दिवस इसका इतिहास और सामाजिक औचित्य !

मातृ दिवस इसका इतिहास और सामाजिक औचित्य !

820
0
SHARE
Mother Day Anna Jarvis
Mother Day Anna Jarvis
Mother Day Anna Jarvis

https://www.facebook.com/adarsh.dhawan.3

 

भाई आदर्श धवन जी द्वारा बहुत ही सुंदर लेख …

मातृ दिवस इसका इतिहास और सामाजिक औचित्य !
आधुनिक मातृ दिवस की शुरुआत एना जारवीस ने अपनी माता एन रीव्स के कार्यों को प्रोत्साहित करने के लिए 1900 के आसपास किया जिसे अमेरिकी सरकार ने 1908 मे अस्वीकार कर दिया परंतु एना जरवीस के प्रयासों से 1914 के आसपास अधिकांश लोगों के इसका स्वागत किया । सरकार को विशेष कुछ करना नहीं था इस दिवस के लिए क्योंकि आप ध्यान दें पितृ दिवस मातृ दिवस इत्यादि मात्र रविवार को ही मनाया जाता है । तो सरकार से सार्वजनिक अवकाश की मान्यता लेने का प्रश्न ही नहीं होता ।
एन रीव्स ने अपने जीवन काल में अमेरिका के गृह युद्ध मे मारे लोगों के परिवारों को जोड़ने का बहुत काम किया था । 1850 के आसपास से जब अमेरिका के तानाशाहों के विरोध मे प्रताड़ित लोगों ने विद्रोह किया तो सरकार ने अपनी सैन्य शक्ति से उसको दबा दिया लगभग 50 वर्षों कर अमरीका में इसके कारण गृह युद्ध चलता रहा । लाखों लोग मारे गए लाखों घर तबाह हुए तो एन रीव्स ने उन्हीं परिवारों के मिलन के लिए काम किया और लोगों में नाम कमाया । इस दिन लोग अपनी माताओं को गुलनार के फूल भेंट दिया करते थे क्योंकि एन रीव्स का सबसे पसंदीदा फूल गुलनार का था । कालांतर में इसका व्यावसायीकरण होने लगा ।
दुर्भाग्य से आधुनिक मातृ दिवस के जन्मदात्री एना जारवीस ने मात्र 35 वर्षों के अंदर ही यह मान लिया और पछताने लगी क्यूंकी इस मातृ दिवस पर भावनाओं से अधिक धन का दुरुपयोग होने लगा । आप कल्पना करें की व्यावसायीकरण के विरोध मे 1948 मे उन्हे हिरासत मे ले लिया गया और उसी वर्ष उनका देहांत हो गया । अपने आखिरी समय में वह इसके बाजारीकरण मे खोते आस्तित्व से बहुत दुखी थीं ।
अब यदि और पीछे यूरोपीय सभ्यता की बात करें 15वीं शताब्दी तक के ब्रितानी साम्राज्य मे गरीबी अधिक होने के कारण और लोगों में अधिक वासना, या भोग को ही जीवन का अंतिम सत्य मानने के कारण परिवार नहीं होते थे और सन्तान को तो वहाँ पर अभिशाप और अपने आनंद में बाधक माना जाता था । आज आप देखें इसी कारण से उन देशों में जनसंख्या वृद्धि कभी भी नहीं हुई । यदि आपकी फिर भी सन्तान हो जाती थी तो लोग गरीबी और बोझ के कारण उसे पालना नहीं चाहते थे । फलस्वरूप लोगों अपनी सन्तान को रात के अंधेरे में चर्च पर छोड देना था । अब उस बच्चे का लालन पालन चर्च का मुखिया करता था । इसी कारण आप देखें उस पादरी को FATHER कहते हैं और उसे विवाह का अधिकार नहीं होता था । कारण स्पष्ट था की अपनी सन्तान होने के बाद शायद अनाथों को पालने में चर्च का पादरी ढीला पढ़ कर अपने खुद की सन्तान पर अधिक ध्यान देना न शुरू कर दे । हमारे भारतीय समाज में अधिकांश ऋषियों ने विवाह करके ही सन्यास लिया और वही हमारी परंपरा रही । परिवार से भाग कर सन्यास की परंपरा नहीं रही, हाँ जो ऋषि या सन्यासी अपनी इच्छा से विवाह न करे उसका स्वागत भी किया गया । अधिकांश स्थानों पर तो ऋषि अपनी ऋषिकाओं या अपनी पत्नी के साथ ही तपस्या पर जाते थे ।
चर्च में होने के कारण जब बच्चे पढ़ लिख कर या अपने काम काज में आगे बढ़ते तो फिर भी हर रविवार को जिस चर्च ने उनका पालन किया उस पर आते थे । उनमें से एक रविवार को जिस महिला शक्ति ने उनका लालन पालन किया था उसे उफार स्वरूप या उस दिन उसका एहसान मानते हुए वर्ष में एक दिन उसे उफार देकर आशीर्वाद लेते थे । कालांतर में वही दिन mothers day मनाया जाने लगा । और फिर आयी इसके व्यवसायीकरण की बारी ।
भारत देश में mothers day या fathers day की परम्परा न होने का कारण है कि मेरे देश में माता पिता को आजीवन पूजा जाता है इसके लिए यहाँ दिन नहीं रखा गया । परन्तु शायद आज तथाकथित आधुनिकता के नाम पर हम भी कार्ड ले कर, मां को दो मैसेज दे कर facebook पर या whatsapp पर संदेश दे कर अपने आपको दुनिया की दौड़ मे आगे समझते हैं । जिस देश में माता पिता ही सबसे पहले देवता माने जाते हैं । कहा भी है “त्वमेव माता च पिता त्वमेव” हमने तो ईश्वर की परिकल्पना को भी माता पिता से जोड़ दिया है । यहाँ इस दिन का कितना औचित्य है, यह सोचने का विषय है । एक संदेश यह भी आया है कि यदि Facebook से आधा प्रेम भी घर पर माता पिता को दे दें तो शायद आज भारत के वृद्ध आश्रम बंद हो जाएँगे ।

Also Read:  Top Ten Reasons to Oppose the IMF

 

http://www.mothersdaycelebration.com/mothers-day-history.html

https://en.wikipedia.org/wiki/American_Civil_War

https://en.wikipedia.org/wiki/Mother%27s_Day

 

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY