भिक्षा और भीख में जमीन आसमान का अंतर

भिक्षा और भीख में जमीन आसमान का अंतर

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दान भीख भिक्षा
दान भीख भिक्षा
                                                        दान भीख भिक्षा

भिक्षा , भीख और दान मे अंतर

भीख :-

भीख (सिर्फ भिखारी) मांगने वाले को सहायता के रूप मे व् दया स्वरूप दी जाती है भीख का कोई उद्देश्य नही होता । भीख देने के लिए किसी की योग्यता-अयोग्यता भी नही देखी जाती है ।

भिक्षा :-

भिक्षा लेने वाले से ये आशा की जाती है कि वह इसे लेकर सभी के हित के लिए कार्य करेगा या फिर स्वयं का जीवन यापन करेगा और पूरी तरह सभी के हित के लिए समर्पित रहेगा. अपना कोई भी स्वार्थ उससे पूर्ण नहीं करेगा.

वेदिक काल मे भिक्षा ब्राह्मणो द्वारा ली जाती थी ताकि वे सामान्य व सादा जीवन जी सकें और सामाजिक कार्य कर सकें. उन्हे अपने पेट भरने के लिए किसी भी तरह की चिंता न करनी पड़े, ऐसा होने के पश्चात ही वह सामाजिक कार्य को पूर्ण रूप से बिना विचलित हुए निभा पायेंगे.जिससे वे अपनी वेदाध्यन व्  विध्यार्थियों को निशुल्क शिक्षा आदि कार्य कर सकें ।

भिक्षा के लिए योग्यता की आवश्यकता जरूरी  है सभी के हित के उद्देश्य से भेंट पाने की इच्छा भिक्षा कहलाती है । बहुत बड़ा अंतर है भीख और भिक्षा मे ।

दान:-

दान मे भी भिक्षा के ही समान लक्षण होते हैं परंतु अंतर इतना होता है कि दान देने वाला इन्ही सब कारणो व लक्षणो आदि को ध्यान मे रखते हुये स्वयं जाकर इच्छित स्थान पर , समय मे या व्यक्ति को दान देता है दान कई प्रकार के होते हैं परंतु भीख और भिक्षा का कई प्रकार नहीं होता..

सनातन जीवन पद्धति में भिक्षा का महत्व

भिक्षा सनातन शिक्षा पद्धति का आवश्यक अंग था क्योंकि भिक्षाटन से समाज का वास्तविक ज्ञान होता है, दुर्गुण दूर होकर अहंकार पूरी तरह नष्ट हो जाता है, मन शांति होता है और भविष्य का अज्ञात भय समाप्त हो जाता है

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वास्तव में भिक्षा प्राप्ति का सुपात्र कौन है, जो व्यक्ति समाज के हितार्थ अपना सब कुछ त्याग कर सामाजिक उत्थान के लिये कार्य करते हैं वह भिक्षा प्राप्ति हेतु सुपात्र हैं ।

कुछ लोग भीख या दान को भ्रमवश भिक्षा मान लेते हैं यह गलत है भीख भिखारी को सहायतार्थ दया रूप से दी जाती है तथा दान देने वाला स्वयं जाकर इच्छित स्थान व समय पर धार्मिक कारणों से स्वेच्छा से देता है ।

जबकि भिक्षा एक सामाजिक अनिवार्यता है जब से भिक्षाटन व्यवस्था समाप्त हुई समाज टूटी माला की तरह बिखर गया सामाजिक कार्य करने वाले व्यवसायी हो गये और समाज भावनाविहीन ठगों की भीड़ में बदल गया ।

सामाजिक अस्वीकार से यह जीवन शैली विलुप्त हो गई किन्तु यदि समाज को पुनः जीवित करना है तो पुनः भिक्षु पैदा करने होंगें भिखारी नहीं ।

 

भिक्षुयो ने क्या किया है ?

  1. पहले जो भी भिक्षुक होते थे वो सभी अपने व्यवसाय व् व्यापर नहीं करते थे, यह परम आवश्यक था. इसी वजह से वह निष्पक्ष होकर शिक्षा का कार्य पूर्ण निष्ठा से कर पाते थे. आचार्य चाणक्य, आचार्य द्रोण इनके सबसे उत्कृष्ट उदाहरन हैं. आज की शिक्षा व्यवस्था के मूल में पैसा है. अगर आज आप किसी शिक्षक को पैसे न दें तो वो शिक्षा देना तुरंत बंद कर देगा, उल्टा पैसे की भूख और लालच ने शिक्षा को व्यवसाय बनाकर रख दिया है.. इस शिक्षा व्यवस्था में तो लालची भूखे लोग ही जन्म लेंगे.
  2. साधू सन्यासी लोग ऐसे ऐसे आविष्कार करते थे जिससे समाज को नए व् सरल तरीके पता चलते थे (जिन्हें आज साइंटिस्ट कहते हैं)हमारे यहाँ उन्हें साधू महात्मा कहते थे. कुम्भ मेलो का समय और जगह निश्चित होती थी जिसके अनुसार सभी साइंटिस्ट एक जगह इकठ्ठा होकर अपनी खोज को सबके सामने रखते थे और विश्व की समस्याओं पर चिन्तन मंथन व् उनका हल निकालते थे.
  3. मुस्लिम साम्राज्य से बचाव के लिए सिंह की सेना बनाई गयी जिसमे सभी हिन्दुओ सनातन धर्मियों ने अपना बड़ा बेटा भारत की रक्षा के लिए भिक्षा में गुरु को दिया.
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तो हमारे यहाँ भिक्षा में बेटा तक दिया जाता था जिससे की वह समाज के हित के लिए पूर्ण रूप से लग सके.

भिक्षु क्या करेंगे ?

  1. समाज में शिक्षा की जिम्मेदारी
  2. समाज की रक्षा की जिम्मेदारी
  3. समाज की न्याय व्यवस्था की जिम्मेदारी

आज की इस विनाश की व्यवस्था से निकलने का हल किसी के भी पास नहीं है,

ऐसे में यह एक रास्ता हमें समझ आता है

की हम अपने हर घर से एक पुत्र भिक्षा में दें और उसके माध्यम से पूरा परिवार राष्ट्र की सेवा के कार्य में लगे.

उदाहरन के लिए

हम सभी परिवार किसी न किसी 1 व्यक्ति से जुडें जिसकी जिम्मेदारी पूर्ण रूप से हमारा समाज उठाये. जैसे हर परिवार से 1000 रूपये मासिक लिए जायें और ऐसे 30 परिवार होंगे तो 30000 रूपये मासिक से उस व्यक्ति का जीवन यापन सफलता पूर्वक हो जायेगा. वो अपना पूरा ध्यान समाजिक कार्य में लगा सकेगा, जैसे आपके 30 परिवार के बच्चों को शिक्षित करना, आप सभी के लिए अच्छे अनाज की उपज करना, आप सभी के चिकित्सा के लिए प्राकृतिक चिकत्सा करना इत्यादि.

उस व्यक्ति को कदापि भी नौकर न समझें और उसको दी हुई भिक्षा को कभी भी मेहनताना न समझें. उससे पहले समझ लें की वो क्या करना चाहता है, कैसे करेगा और उसके उस कार्य से अगर समाज का भला होता है तो हम उस व्यक्ति की अवश्य हर सम्भव मदद करें क्यूंकि वह अपना सर्वस्व समाज हित में लगा रहा है और धनोपार्जन में व्यस्त नहीं है.  पुरे देश में 7.5 लाख गाँव हैं, अगर सिर्फ इतने ही भिक्षु बन जायें तो इस देश की स्तिथि बदल जाएगी..

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