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भारत के एक महान वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बोस जी ने एक प्रयोग किया और साबित किया की पेड़ पौधों में भी अन्य जीवों की तरह प्राण व् संवेदना होती है.

उन्होंने 1 दिन 2 पौधे रोपे.
1 को पुचकारा, प्रेम किया, खूब फलने फूलने का आशीर्वाद दिया, उसकी खूब सेवा की, तारीफ की..
दुसरे पौधे को उन्होंने खूब डांट लगे, कोसा, बुरा बोला, दुत्कारा और शाप जैसे बोले की तू नही फलेगा, तू नही बढेगा..

नतीजा क्या हुआ ?

जिसको पुचकारा वो पौधा समृध हो गया
जिसको दुत्कारा वः पौधा सुख गया, मुरझा गया और अंततः मर गया.

जो बात पौधों के लिए सच है, मनुष्य के लिए सच है, जीवों के लिए सच है, वह बात समाज, जाती और राष्ट्र के लिए भी सच है.

आखिर कैसे कोई देश कोई समाज 1 बड़े नेता के पीछे उठकर चल देता है, आखिर क्या होता है उस नेता की वाणी में

और व्ही देश व्ही समाज जब उस वाणी को बरसो से नही सुनता तो अधमरा सा , शीण सा, मर सा जाता है..

ऐसा hi हुआ है हमारे देश के साथ .

जैसे वह एक पौधा गलत बातें सुनकर hi खत्म हो गया, उसी प्रकार पिछले 350 वर्षों से हम भी भारत के गलत सलत इतिहास हो पढ़कर, रटकर, उसी को सच मानकर अपने hi राष्ट्र को गाली देने लग गये.
बिना यह सोचे समझे की :-

1 की भारत का इतिहास लिखा किसने ?? भारतियों ने ?? किन भारतियों ने ?? किसके राज में ?? किसने उनसे क्या लिखवाया ??
2 इस देश पर राज करने वाले लोग इस देश को लुटने आये थे या समृद्ध बनाने ??
3 उनका स्वयं का क्या इतिहास है ?? क्या जानते हैं हम उनके संस्कृति और सोच के बारे में ??

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इस देश की प्रतिभा पर शासन करने वाले पश्चिमी विद्वानों, उनके राजनितिक प्रतिनिधियों, उनके भारतवंशी मानस पुत्रो ने इस देश को इतना दुत्कारा, इतना धिक्कारा, इतना छोटा समझने को मजबूर किया है, उसे इतना दिन दुखी पतित दरिद्र साबित किया है की हम भारतवासी स्वयम अपनी आँखों में गिर गए हैं.
हमे वो सब कहा गया जो हमने कभी किया नहीं.
हमपर वो चीजें थोप दी गयीं जो हमने कभी की नहीं.
हमारे अंदर वह अवगुण तलाश दिए गये जिनका कोई अस्तित्व hi न था

आखिर कुछ गुण तो हमारे अंदर भी रहे hi होंगे जो यूनान मिस्र रोम के इस जहाँ से मिट जाने पर भी हमारा अस्तित्व है. हमारी हस्ती क्यूँ नही मिटी ??

हमारे उन गुणों पर, खूबियों पर, खासियतो पर, खडिया पॉट दी गयी
हमारे एक मिल्पथर पर लिखा था संस्कृत उसको मिटाकर अंग्रेजी लिख दिया गया .
हमारे एल मिल्पथर पर हिंदी, बंगाली, गुजरती, तेलुगु, मराठी, कन्नड़, उड़िया और न जाने कितनी भाषाएँ लिखी थी, उन सब को मिटाकर लिख दिया गया अंग्रेजी अंग्रेजी अंग्रेजी …
हमारे कालिदास के मिल्पथर पर शेक्सपियर लिख दिया गया
कुचिपुड़ी की जगह रॉक
शंकराचार्य की जगह बौधों की समाप्ति
कबीर की जगह हिन्दू मुसलमान
और भारतवर्ष की जगह पोत दिया गया इंडिया
जब हमने उस भारतवर्ष की आजादी की लड़ाई लड़ी तब एक नया मिल का पत्थर निकला इंडिया पाकिस्तान
हम बचे खुचे भारत को लेकर चले तो एक और पत्थर निकला हम द्रविड़ हैं, उत्तर भारत अलग है
फिर तो रोज hi नये पत्थर हम फलां हैं और भारत से अलग होना चाहते हैं ..

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यह सब बातें आपने आप नही हुई.. इन मील ले पत्थरो को गड़ा गया उन पर सवयम कुछ अंकित नही हुआ, उन पर इबारतें लिखी गयीं..

हम इन्ही सबको सच मान लें और इसी सोच में मग्न रहें और उबर hi न पाएं, हमारी सोच, दिल दिमाग और भावना सब वैसे hi बन जाये, इसका भी पूरा इंतजाम किया जा चूका है. हम भी यूनान रोम मिस्र की तरह मिट जायें इसकी कोशिश हर बढ़ते पल के साथ बढ़ रही है.

इसको अंजाम दिया है इतिहास के माध्यम से .

वो तो नमन है उन ऋषि मुनियों को जिन्होंने कैसे सरे देश का भ्रमण कर करके देश के इतिहास की मीठी स्म्रतियों को हमारे आंदोलनों को, हमारे जीवन के प्रति विकसित दृष्टिकोण को , अद्भुत घटनाओ को लोगों के बीच गाथाओ, उपमाओ, दृष्टान्तो की सहायता से ऐसा सुना गये की हमे अपना सारा इतिहास आज भी याद है और ऐसा याद है की कितना पानी सर के ऊपर से गुजर गया, पर हस्ती हमारी मिटाए से नही मिटी.

वह पश्चिमी पोषक जो छलिये थे, जिन्हे अपने अलावा किसी की कोई बात ठीक hi नजर नही आती थी, हमे समझाने लगे और हमारा इतिहास लिखने का दंभ भी किया. हमारे लोगों को नकली इतिहास को hi असली समझने का चस्मा भी पहना गए. कुछ जयचंदों और मीर जाफरों को हमारे सर पर बाप और चाचा बनाकर बिठा गए.

तो समझदारी किस्मे हैं ?
व्ही चश्मा पहने रखा जाये ?
या फिर इन नकली मील के पत्थरों पर की गयी पुताई को पौंच कर जरा उस इबारत को पढ़ा जाये जो हमने hi लिखी थी, स्वयम अपने हाथो से लिखी थी..

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