बिकाऊ मीडिया

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पाञ्चजन्य

सूत्रो के हवाले हवाई आरोप

नारद
बिना किसी ‘स्कैडल’ या घोटाले के नरेंद्र मोदी सरकार का एक साल पूरा होना बहुतों को खटक गया। ये कसक पहली सालगिरह को लेकर मीडिया में चल रही चर्चाओं में साफ दिखाई देती रही। अंग्रेजी मीडिया का एक बड़ा तबका हताशा के स्तर तक जा चुका है। इसी का नतीजा है कि विपक्ष या ‘सूत्रों के हवाले से’ लगाए जाने वाले हवाई आरोपों की इन दिनों बाढ़ सी है। सारा जोर देश में सकारात्मक माहौल को दबाकर नकारात्मक स्थिति पैदा करने की है। 
बीते हफ्ते लगभग सभी अंग्रेजी समाचार चैनलों ने ललित मोदी को सुषमा स्वराज की तरफ से मिली कथित मदद का मुद्दा इतने जोर-शोर से उठाया, मानो कोई बड़ा तूफान आ गया हो। ब्रिटिश अखबार द संडे टाइम्स में छपी एक खबर को टाइम्स नाऊ और उसके आत्ममुग्ध मुखिया अर्णब गोस्वामी ने फौरन अपना ‘एक्सक्लूसिव’ बना लिया। दावा किया कि ये पिछले 10 साल का सबसे बड़ा खुलासा है। मतलब कोयला, 2जी, हथियारों की खरीद और आदर्श जैसे तमाम घोटालों से बड़ा खुलासा होने वाला है। ये बात जाहिर होते देर नहीं लगी कि बात का बतंगड़ बनाया जा रहा है। ललित मोदी की बीमार पत्नी का पुर्तगाल के एक अस्पताल में ऑपरेशन होना था। ललित मोदी को वहां जाने के लिए यात्रा के दस्तावेजों की जरूरत थी। सुषमा स्वराज ने मानवीय आधार पर मदद की सिफारिश की थी और साफ लिखा कि ब्रिटेन के नियम-कायदों के दायरे में रहते हुए ही मदद दी जाए। लेकिन इस महत्वपूर्ण तथ्य को बड़ी चालाकी से छिपाते हुए पूरे मामले को अलग ही रंग दे दिया गया। अपनी बहसों में अर्णब गोस्वामी भाषा और शब्दों की सारी मर्यादाएं लांघ गए। उन्होंने फतवा जारी कर दिया कि सुषमा स्वराज फौरन इस्तीफा दें। बहस के दौरान बीच-बीच में अर्णब अपने चैनल की ‘महान पत्रकारिता’ और उच्च आदशोंर् के बारे में शेखी बघारना नहीं भूलते। लेकिन जब किसी ने उनसे राडिया टेप कांड में पकड़ी जा चुकी उनकी ही एक सहयोगी के बारे में पूछ दिया तो वेे बौखला उठे। अगर वाकई अर्णब गोस्वामी पत्रकारिता के इतने ही ऊंचे आदशोंर् पर चल रहे हैं तो पहले वेे अपनी उस सहयोगी से इस्तीफा क्यों नहीं लेते?
म्यांमार में भारतीय सेना ने उग्रवादियों के ठिकानों पर हमला करके उन्हें तहस-नहस कर दिया। इस समाचार से भले ही हर भारतीय का सिर गर्व से तन गया हो, मीडिया का एक तबका इस पर भी विवाद पैदा करने में सफल रहा। विपक्ष के उन नेताओं के बयानों को खूब तूल दिया गया, जिन्होंने इस ऑपरेशन पर ही सवाल खड़े करने की कोशिश की। हद तो तब हो गई जब एक गलत तस्वीर को बिना उसकी प्रामाणिकता जांचे भारतीय सैनिक अभियान दल की तस्वीर बताकर अखबारों ने छापा और टीवी चैनलों ने दिखाया। गलती सामने आने के बाद भी किसी ने इस भूल पर माफी मांगने की जरूरत नहीं समझी। कल्पना और न जाने किन अज्ञात सूत्रों के हवाले से दी गई खबरों को तथ्य मानते हुए सरकार और सेना को कठघरे में खड़ा करने तक की कोशिश की गई। 
मीडिया के एक तबके ने योग दिवस को लेकर भी विवाद पैदा करने की भरपूर कोशिश की। लेकिन नाकामी ही हाथ लगी। कुछ कठमुल्लाओं को छोड़कर सभी मतों के लोगों में योग दिवस को लेकर उत्सुकता का माहौल है। अच्छी बात यह रही कि मीडिया में ऐसी सकारात्मक खबरों को भी भरपूर जगह मिली। लगभग सभी समाचार चैनलों ने ऐसे मुसलमानों की कहानियां भी दिखाईं जिन्होंने न सिर्फ योग को अपनाया, बल्कि उसका प्रचार-प्रसार भी कर रहे हैं। एबीपी न्यूज चैनल ने नए-नए योगासन सिखाने के लिए छोटा सा ‘सेगमेंट’ भी शुरू     किया है।
उधर दिल्ली की केजरीवाल सरकार येन केन प्रकारेण सुर्खियों में बने रहने में कामयाब रही। ऐसा नहीं लगता कि केजरीवाल से मीडिया का प्रेम खत्म हुआ हो। फर्जी डिग्री के आरोप में जितेंद्र तोमर की गिरफ्तारी हुई तो मीडिया का एक बड़ा तबका ये साबित करता रहा कि केंद्र सरकार बदले की कार्रवाई कर रही है। लेकिन जब सचाई सामने आ गई और केजरीवाल के लिए अपना चेहरा छिपाना मुश्किल हो गया तो एक बार फिर से उनके बचाव में मीडिया सामने आई। आजतक, एबीपी न्यूज और एनडीटीवी के जरिए बाकायदा ये समाचार फैलाया गया कि केजरीवाल बहुत नाराज हैं क्योंकि जितेंद्र तोमर ने अपनी डिग्री के बारे में उन्हें बेवकूफ बनाया। ये बिल्कुल वही शैली है जैसे मनमोहन सरकार के वक्त सोनिया गांधी की नाराजगी की खबरें मीडिया में ‘प्लांट’ कराई जाती थीं। फिलहाल दिल्ली के इस तमाशे की वजह से बाकी देश के तमाम जरूरी मुद्दे कहीं न कहीं दबे जा रहे हैं। राहुल गांधी को लेकर मीडिया और कांग्रेस पार्टी की कशमकश जारी है। टीवी चैनलों ने राहुल की छत्तीसगढ़ यात्रा को भरपूर कवरेज दी, लेकिन न जाने क्यों यह नहीं बताया कि कैसे उन्होंने कोरबा में वनवासियों के आगे भाषण में कुछ ऐसी बातें कहीं कि सुनने वालों को हंसी छूट जाए। मुख्यधारा मीडिया ने भले ही राहुल की बातों को नजरअंदाज कर दिया हो, लेकिन सोशल मीडिया पर उनकी जमकर खिल्ली उड़ी। मैगी को लेकर भी बीते 10-15 दिन खूब हंगामा मचा रहा। लेकिन किसी गंभीर मुद्दे को कैसे चुटकुले में बदल दिया जाए, ये टीवी चैनलों से सीखा जा सकता है। मैगी के बहाने देश में खाद्य पदाथोंर् की गुणवत्ता और खान-पान में आ रहे बदलावों के असर पर जागरूकता लाई जा सकती थी। लेकिन अपनी इस जिम्मेदारी के बजाय ज्यादातर जगहों पर पाबंदी और       उससे जुड़ी राजनीति पर ही ज्यादा ध्यान    दिखाई दिया।     

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