प्राकृतिक कृषि का अर्थ

प्राकृतिक कृषि का अर्थ

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प्राकृतिक मतलब प्रकृति जो स्वयं प्रकट हुआ हो.

जैसे भगवान
भ से भूमि
ग से गगन
व् से वायु
अ से अग्नि
न से नीर (जल)

इन्हीं पञ्च तत्वों से बना है शब्द भगवान
वही भगवान जिनकी हम पूजा करते हैं
वही तत्व जिनसे हर प्राकृतिक वस्तु बनी है..
इसीलिए हि कहते हैं की कण कण में , हर जीव में भगवान मौजूद हैं .

आप एक नयी फसल जो पक कर तैयार खड़ी है, उसको काटिए और 100 किलो वजन की फसल एक तरफ रखिये (फसल की जगह कुछ भी जैसे खरपतवार भी ले सकते हैं )

याद रखिये उसका आज का वजन १०० किलो है.
उसको धुप में रख दीजिये, 1-२ महीने सूखने दीजिये.
सूखे हुए का जब आप वजन करेंगे तो पायेंगे उसका वजन सिर्फ २५-३०% रह गया
बाकी का क्या था जो उसमे अब नहीं है ?? उन पञ्च तत्वों में से कौनसा तत्व निकल गया ?? नीर यानि जल  …?

अब उस में अग्नि लगा दीजिये …
सब कुछ जलकर ख़ाक हो जायेगा , बचेगा क्या सिर्फ राख …
लेकिन उस राख का वजन कितना है ?? १०० किलो ? २५-३० किलो ? या कुछ ग्राम ?
औसतन वो राख मात्र 1.५ किलो आएगी.

इस का सीधा अर्थ, पंचतत्व में से नीर उड़ गया, आकाश तत्व, वायु तत्व, अग्नि तत्व सब कुछ वहीँ उड़ गया जहाँ से वो उसमे आया था..

रह गया भूमि तत्व जो मिल गया उस भूमि में जहाँ से वो आया था…

जो जहाँ से आया है उसको उसी में वापस मिल जाना है … 

इसी प्रकार १०० किलो हाड मांस का मानव जब जलाया जाता है तो बचती है लोटे भर के राख , बाकी सब विलीन..

शारीर जब जिन्दा होता है तब वो पानी में डूबता है , लेकिन उस शरीर के मरने के पश्चात वो तैरने लगता है यानी उस शारीर में वजन किस चीज का था ?? आत्मा या अग्नि तत्व (शरीर ठंडा हो जाना )??

जब कोई जीव (मानव को छोड़कर) मरता है तो उसको जमीन खोदकर दबा दिया जाता है उस जगह अगर कोई फलों का वृक्ष लगाया जाये तो वो बहुत हि फलदार होता है.

ये सब आपको समझाना जरुरी था  आज की रासयनिक खेती को समझने के लिए .

आज जब किसान खेत में यूरिया डालता है तो इससे मिटटी में रहने वालो करोड़ों छोटे जीव (जैसे केंचुआ इत्यादि) मरते हैं. उनके मरने से उस जगह इनकी समाधी बन जाती है, उनसे इन्हीं पंचतत्वों का निकलना शुरू होता है और नतीजतन वो खाद का काम करता है और फसल को येही पंचतत्व मिलते हैं जिनसे वो ज्यादा तेजी से विकसित होती है. ये वो कृषि पद्दति है जिसमे करोड़ों जीवों को मारकर उनके द्वारा प्राप्त पंचतत्वों से कृषि की जाती है. भारत में ये कृषि का माध्यम कभी नहीं था . ये है आपका हरित क्रांति. जिसमे भूखें पेट के लिए अनाज की गिनती को बढाया लेकिन उसकी गुणवत्ता इतनी गिरा दी गयी की पहले कुछ लोग भूखे मरते थे, आज वो भूख से नहीं बिमारयों से मरते हैं. वो किसान जो इस खेती को करता है सबसे ज्यादा उसका बुरा हाल है. पंजाब के फिरोजपुर से कैंसर ट्रेन चलती है. पंजाब हि वोही राज्य है जिसने सबसे पहले इस कृषि को अपनाया और आज पंजाब हि है जो सबसे बड़े संकटों से जूझ रहा है. (गिरता स्वास्थ्य , गिरता जमीन का जलस्तर )

 प्राकृतिक खेती 

प्राकृतिक कृषि में जमीन पर देसी गाय का गोबर डाला जाता है . (ताजा गोबर पानी के साथ , या फिर जीवामृत बनाकर खेत में डाला जाता है)
ये गोबर जमीन के अंदर रहने वाले केंचुओ का प्रिय भोजन है. उनको जैसे हि इसकी गंध मिलती है वो जमीन के १५ फीट निचे से निकलकर ऊपर की तरफ भागते हैं. नतीजा खेत में लाखों करोड़ों की संख्या में छोटे छोटे अनगिनत छिद्र हो जाते हैं, यानि जुताई, खेत की मिटटी हलकी व् भुरभुरी हो जाती है. ट्रेक्टर की कोई जरूरत नहीं .

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इस ऊपर निचे आने जाने की अवस्था में निचे की मीट्टी ऊपर की सतह पर आती है और ऊपर की निचे, इससे खेत की मिटटी बदल जाती है और उर्वरक मिटटी ऊपर आ जाती है,

आप जब कभी पगडण्डी पर या कचे रस्ते से गुजरें और गोबर पड़ा मिले तो उसको पलटने पर पायेंगे की उसके निचे जमीन में कुछ छेद हैं, वो किसने किये ? केंचुए ने..

यह देसी केंचुआ (earthworm) हमारे किसान का प्राकृतिक ट्रेक्टर है, जो मुफ्त में जुताई करता है, २४ घंटे, दिन रात, बिना किसी पैसे के, न कोई डीजल के, इसको चाहिए बस ताज़ा गोबर वो भी सिर्फ देसी गाय का.

जब ये केंचुए जमीन की मिटटी पलट देते हैं तो साथ हि इनके द्वारा छोड़ी गयी असंख्य छोटी छोटी गोलियां (इनकी विष्टा potty) जमीन पर दिखती हैं. ये वो खाद है जो पौधों को चाहिए. लेकिन ये बिलकुल वैसा हि है जैसा मानव के सामने गेहूं है जिसको वो रोटी के रूप में खा सकता है, गेहूं के रूप में नही.

अब इन गोलियों को ऐसे रूप में विकसित करना, जिससे की पौधा उनको खा सके, वो काम दुसरे जीव करते हैं. ये हैं सूक्षम जीव जो की 1 ग्राम देसी गाय के गोबर में ३ करोड़ की संख्या में पाए जाते हैं.

ये सब उसी गाय के गोबर में से आते हैं.

इस तरफ से देसी गाय का गोबर दो काम करता है :- 1 ट्रेक्टर को बुलाना. २ देसी खाद का इंतजाम

इस तरह से भारत में कृषि होती आई . लेकिन कुछ लोगों की अमीर बन्ने की चाहत ने दुनिया को विनाश के मार्ग पर धकेल दिया.

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ट्रेक्टर बेचना
बीज बेचना
खाद बेचना
नतीजा कृषि कार्य महंगे होते गए और किसान कर्ज तले दबता गया और अंत में आत्महत्या करके मृत्य्लोक सीधार गया.

इस यूरिया की खेती से जमीन हर साल सख्त होती जाती है, जिससे हर २-३ साल ज्यादा हॉर्स पॉवर वाले ट्रेक्टर खरीदने की जरुरत पड़ती है. जमीन भी बंजर और खर्चा भी बढ़ता जाता है. नतीजा खेती छोड़ किसान शहर की और भागता है और गुलामी की नौकरी में शोषित होता है.

इस देश की इन सभी समस्याओं का समाधान है प्राकृतिक कृषि में :-

  1. किसानो की आत्महत्या
  2. गिरता जमीन का जलस्तर
  3. कैंसर और अन्य लाइलाज रोग (गिरता स्वास्थ्य )
  4. गरीबी 
  5. भ्रटाचार 
  6. महंगाई 
  7. गिरती अर्थव्यवस्था (रुपया कमजोर क्यूंकि खाद और तेल आयत होता है )
  8. उत्पाद में गुणवत्ता की कमी 
  9. मिलावटखोरी
  10. युवाओं में बढ़ता नशा 
  11. देसी गौ माता की हत्या 
  12. असली दूध की कमी 
  13. जैविक के नाम पर जनता की लूट (३ गुने दाम ).
आप सभी से निवेदन है की कृपया 100 परिवारों का समूह बनाएं और एक किसान को गोद लें, उसको प्राकृतिक कृषि की तरफ ले जाएँ, उसकी सारी फसल खरीद कर अपने १०० परिवारों को सेहतमंद असली शुद्ध भोजन की व्यवस्था करें, किसान को भी लाभांश दे, इसके लिए आप अपने इस समूह में एक व्यक्ति को जिमीदारी सौंपे. 
क्यूंकि आप सभी परिवार रोज वो अनाज खाते हैं और वो भी एक दिन में ३ बार, अगर वोही शुद्ध नहीं तो क्या होगी आपकी सेहत और क्या होगा आपका जीवन.. 
आप इस तरह से शुरुआत कर सकते हैं :-
  1. अपने परिवार, मित्र, पडोसी को इस बारे में जागरूक करें. चर्चा करें, जरुरत पड़े तो हमसे भी संपर्क करें.
  2. इस तरह से आपका एक समूह बन जाये. फिर वो समूह अपने खाने पिने की सभी वस्तुयों की सूचि बनाये, और उनके खरीद के भाव भी लिखे. इससे आपके १०० परिवारों की जरुरत (डिमांड) का पता चलेगा. 
  3. आसपास के गाँव में जायें और वहां के किसी किसान को अपनी जरुरत बताएं (जो पहले से ये कृषि कर रहा हो तो उसको प्रोत्साहित करें),  उससे ये समझें की अभी उसको क्या भाव मिलता है और किस वस्तु का (जैसे किसान गेहूं बेचेगा, आप या तो उस गेहूं से आता खुद निकलवाएँ या फिर किसी व्यक्ति की जिम्मेदारी तय कर दें, भले हि उसके लिए आपके समूह को २-३ आदमी नौकरी पर हि क्यूँ न रखने पड़े. (आपकी सालाना दवाइयों की बचत उनकी सैलरी से कहीं ज्यादा हि होगी). 
  4. उस किसान को क्या चाहिए, उसकी फसल जो पकने से पहले हि बिक गयी
  5. आपको क्या चाहिए स्वस्थ जीवन और अपनों का जीवन.
  6. किसान से ये तय कर लें की कृषि पद्दति सिर्फ प्राकृतिक हि होगी. (इसके लिए आप हमसे संपर्क कर सकते हैं )
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ये मैंने अपने मन की बात और अपना अनुभव कहा.

आप भी मुझसे अपने सुझाव साझा करें 
और बताएं की क्या हम ऐसा कुछ कर सकते हैं ? क्या ये स्वयं की सेवा, समाज की सेवा, या देश सेवा जैसा कार्य नहीं है ?
आइये मिलकर आप और हम बदले अपना जीवन. 
कम करें निर्भरता बाज़ार पर और सरकार पर से.
जुडें हमारे अन्नदाता से, जब अन्नदाता खुश तो हम सब खुश. 
धन्यवाद
CA नवनीत सिंघल
९५६०७२३२३४
9560723234

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