पुना समझौता जिसने नीव रखी आरक्षण की

पुना समझौता जिसने नीव रखी आरक्षण की

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यह सर्वविदित है कि महात्मा गांधी वर्ण व्यवस्था के पोषक थे। इसके पीछे वे तर्क देते थे कि यह व्यवस्था विश्व के अधिकांश उन्नत समाजों में देखने मिलती है। वे जाति भेद को वर्ण भेद से अलग मानते थे। वे मानते है कि वर्ण व्यवस्था में ऊँच-नीच की भेद वृत्ति नहीं है। वे मनु की तरह वर्गो को उच्च और निम्न बड़ा या छोटा नहीं मानते है।

गांधीजी के हरिजन उत्थान मुद्दे पर निम्न चार बिन्दुओं को उद्धृत किया जाता है जो इस प्रकार है-

पुना पैक्ट जिसमें उन्होंने यरवदा जेल में अनशन किया था।अपनी पत्रिका का नाम हरिजन (गांधीजी का अँगरेज़ी साप्ताहिक विचार पत्र) रखना।साबरमती आश्रम में अछुत जातियों को शामिल करना।दिल्ली की एक भंगी बस्ती में कुछ दिन प्रवास करना।

यहाँ पर हमें गांधीजी के व्दारा समय समय पर किये गये इन कार्यो की एतिहासिक, सामाजिक एवं राजनीतिक पहलूओं पर चर्चा करेगें साथ-साथ अपना ध्यान इस ओर भी आकृष्ट करेगे की इस मुद्दे पर उनके विचार क्या थे तथा व्यवहारिक धरातल पर उनके विचार क्या प्रभाव छोड़ते है।

वैसे गांधी के परिप्रेक्ष्य में दलित (यहाँ हरिजन कहना उचित होगा) के विषय में चर्चा करना एक ग़ैर ज़रूरी पहलू जान पड़ता है। क्योकि दलितों का एक बड़ा समूह गांधी के हरिजन उत्थान पर किये गये कार्यो को संदेह कि निगाह से देखता है। इसका महत्वपूर्ण कारण यह है कि जाति-भेद वर्ण-भेद तथा अस्पृश्यता भेद के उनमूलन सम्बधी ज़्यादातर उनके विचार केवल उपदेशात्मक थे व्यवहारिक नहीं थे।

एक ओर वे वर्ण व्यवस्था के बारे में कहते है-वर्ण व्यवस्था का सिध्दांत ही जीवन निर्वाह तथा लोक-मर्यादा की रक्षा के लिए बनाया गया है। यदि कोई ऐसे काम के योग्य है जो उसे उसके जन्म से नहीं मिला तो व्यक्ति उस काम को कार सकता है। बशर्ते कि वह उस कार्य से जीविका निर्वाह न करे, उसे वह निष्काम भाव से, सेवा भाव से करे लेकिन जीविका निर्वाह के लिए अपना वर्णागत जन्म से प्राप्त कर्म ही करे।

यानी जिसका व्यवसाय शिक्षा देना है वो मैला उठाने का काम मनोरंजन के लिए करें (व्यवसाय के रूप में नहीं)। इसी प्रकार गाय चराने का पुश्तैनी कार्य करने वाले चाहे तो पूजा कराने का काम कर सकते हैं, लेकिन पूजा से लाभ नहीं प्राप्त कर सकते । ज़ाहिर है उच्च व्यवसाय वाला व्यक्ति निम्न व्यवसाय को पेशा के रूप में कभी भी अपनाना नहीं चाहेगा। किन्तु निम्न व्यवसाय वाला व्यक्ति उच्च व्यवसाय को अपनाने की चेष्टा करेगा। अतः यहाँ गांधी जी के उक्त कथन से आशय निकलता है कि यह बंदिश केवल निम्न जातियों के लिए तय की गई ताकी वे उच्च पेशा अपना न सके और आरामतलब तथा उच्च आय वाले पेशे पर उच्च जातियों का ही एकाधिकार रहे। यहाँ स्पष्ट है गांधी जातिगत पेशा के आरक्षण के पक्षधर थे।

कहीं-कहीं पर गांधीजी के विचार साफ़-साफ़ बुजुर्वावर्ग को सुरक्षित करने हेतु रखे गये मालूम होते है-गांधीजी के समाज में विश्वविद्यालय का प्रोफ़ेसर, गाँव का मुन्शी, बड़ा सेनापति, छोटा सिपाही, मजदूर और भंगी सब एक से खानदानी माने जायेंगे। सबकी व्यक्तिगत आर्थिक स्थिति समान होगी इससे प्रतिष्ठा या आय वृध्दि के लिए धन्ध छोड़कर दूसरा धन्धा करने का प्रलोभन नहीं रहेगा।

यानी प्रोफ़ेसर और भंगी दोनें खानदानी माने जायेगें। क्यों माने जायेगे कैसे माने जायेंगे, ये स्पष्ट नहीं है। लेकिन धन्धा बदलने की पाबंदी गांधी स्पष्ट लगाते हैं। जो आज के दौर में प्रासंगिक बिल्कुल भी नहीं है। पहले भी नहीं था। गांधी के क़रीबी एवं फ़ाईनेन्सर टाटा लुहार तो नहीं थे लेकिन लुहार का काम (व्यवसाय) करते थे। ऐसे ही कई उनके क़रीबी थे जो ग़ैरजातिगत पेशा अपनाए हुए थे। गांधी अपनी आत्मकथा में ख़ुद को एक पंन्सेरी बताते है लेकिन सियासत करते थे।

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यहाँ पाठकों का ध्यान आकृष्ट कराना चाहूँगा कि गांधीजी ये मानते थे कि गँवार का बेटा गँवार और कुलीन का बेटा जन्म से ही कुलीन पैदा होता है । वे कहते है कि जैसे मनुष्य अपने पूर्वजों की आकृति पैदा होता है वैसे ही वह ख़ास गुण लेकर ही पैदा होता है।

गांधीजी अछूतपन या अस्पृश्यता का तो विरोध करते हैं। लेकिन एक मेहतर को अपना व्यवसाय बदलने की अनुमति भी नहीं देते है। वे कहते है कि – अपनी संतानों के संदर्भ में प्रत्येक व्यक्ति मेहतर है तथा आधुनिक औषधि विज्ञान का प्रत्येक व्यक्ति एक चमार किन्तु हम उनके कार्य-कलापों को पवित्र कर्म के रूप में देखते है। गांधी जी पेशेगत आनुवंशिक व्यवस्था का समर्थन करते है।

वे एक स्थान पर लिखते है कि ब्राम्हण वंश का पुत्र ब्राम्हण ही होगा, किन्तु बड़े होने पर उससे ब्रामहण जैसे गुण नहीं है तो उसे ब्राम्हण नहीं कहा जा सकेगा। वह ब्राम्हणत्व से च्युत हो जायेगा, दूसरी ओर ब्राम्हण के रूप में उत्पन्न न होने वाला भी ब्राम्हण माना जायेगा यद्यपि वह स्वयं अपने लिए उस उपाधि का दावा नहीं करेगा। यानी कोई भी ग़ैर ब्राम्हण प्रकाण्ड विद्वान होने पर भी पण्डितजी की उपाधि का दावा न करे।

गांधीजी के इन आदर्शों के विपक्ष में डा- अम्बेडकर आपत्ति दर्ज़ कराते है कि जाति-पाँति ने हिन्दू धर्म को नष्ट कर दिया है। चार वर्णो के आधार पर समाज को मान्यता देना असंभव है क्योकि वर्ण व्यवस्था छेदों से भरे बर्तन के समान है। अपने गुणो के आधार पर क़ायम रखने मे यह असमर्थ है। और जाति प्रथा के रूप में विकृत हो जाने की इसकी आंतरिक प्रवृत्ति है।

ज़्यादातर यह माना जाता है कि 1932 के बाद ही गांधीजी के अंदर हरिजन प्रेम उमड़ा। इसके पहले वे निहायत ही परंपरा-पोषी एवं संस्कृतिवादी थे। भारत में दलितों के काले इतिहास के रूप में दर्ज़ यह घटना पूना पैक्ट के नाम से प्रसिध्द है। ज़्यादातर साथी पुना पैक्ट के बारे में अवगत है। दरअसल स्वतंत्रता पूर्व डॉ- अम्बेडकर की सलाह पर अँगरेज़ प्रधान मंत्री रैम्जले मैक्डोनल्ड ने 17 अगस्त 1932 में कम्युनल अवार्ड के अंतर्गत दलितों को दोहरे वोट का अधिकार दिया था। जिसके व्दारा दलितों को यह अधिकार प्राप्त होना था कि आरक्षित स्थानों पर केवल वे ही अपनी पसंद के व्यक्ति को वोट देकर चुन सकते थे तथा सामान्य सीटों पर भी वे अन्य जातियों के प्रत्याशियों को वोट देकर अपनी ताक़त दिखा सकते थे। गांधीजी इस प्रस्ताव के विरूध्द थे उन्होंने यह तर्क दिया कि इससे हरिजन हिन्दुओं से अलग हो जायेगे। उन्होंने लगभग 30 दिनों का आमरण अनशन किया। घोर दबाव में दलितों के मसीहा डॉ- अम्बेडकर को झुकना पड़ा और दलित अपने अधिकार से वंचित हो गये। इसपर जो समझौता हुआ वही आगे चलकर आरक्षण व अन्य सुविधाओं के रूप में साकार हुआ। इसे पूरा दलित समाज काले इतिहास के रूप में आज भी याद करता है।

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पुना पैक्ट के संदर्भ में यरवदा जेल में हुए इस अनशन में गांधीजी जीत तो गये लेकिन उन्होंने दलितों की समस्या को काफ़ी क़रीब से देखा एवं महसूस किया। शायद उनके अंदर जलती हुई पश्चाताप का नतीज़ा ही रहा होगा कि उन्होंने अपनी हरिजन सेवक नाम की हिन्दी साप्ताहिक विचार पत्रिका प्रारंभ 1932 की तथा काफ़ी सारे लेख अस्पृश्यता पर केन्द्रित करते हुए लिखा । उन्होंने अपने आश्रम में पैखाने सफाई हेतु लगे भंगी को हटा कर पारी-पारी सभी को पैखाने सफाई कराने के निर्देश दिये। जिस पर उनका उनकी पत्नी से तक़रार भी हुई।

ऐसा कहा जाता है कि महात्मा गांधी भंगी जाति से बहुत प्रेम करते थे और उन्होंने‘हरिजन शब्द केवल भंगियों को ध्यान में रखते हुए ही इस्तेमाल करना शुरू किया था। दूसरा वाक्या अक़सर सुनाया और बार-बार दोहराया जाता है कि गांधी जी ने कहा था कि-‘यदि मेरा जन्म हो तो मै भंगी के घर पैदा होना चाहूँगा। अक्सर हरिजन नेता इन वाक्यों को गांधीजी के भंगियों के प्रति प्रेम को साबित करने के लिए सुनाते है।

एक दलील और भी दी जाती है कि गांधी जी भंगियों से प्रेम तथा उनकी हालत सुधारने के लिए ही दिल्ली की भंगी बस्ती में कुछ दिन रहे। पर वास्तव में जो सुविधाएँ उन्हे बिरला भवन या साबरमती आश्रम में उपलब्ध थी वही यहाँ उपलब्ध करायी गयी थी। गांधीजी न किसी के हाथ का छुआ पानी पीते थे और न उसके घर मे पका खाना खाते थे। अगर कोई व्यक्ति फल आदि उन्हे भेट करने के लिए लाता था तो वे कहते थे कि मेरी बकरी को खिला दो इसका दूध मै पी लूँगा।

यानी गांधीजी ख़ुद दलितों से एक आवश्यक दूरी बना कर रहे। पत्रिका हरिजन 12 जनवरी सन 1934 में वे लिखते है-‘एक भंगी जो अपने कार्य इच्छा तथा पूर्ण वफ़ादारी के साथ करता है वह भगवान का प्यारा होता है।यानी गांधीजी एक भंगी को भंगी बनाये रखने की वक़ालत करते नज़र आते है।

ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रसिध्द अधिकारी कर्नल सलीमन ने अपनी पुस्तक RAMBLINGS IN OUDH सफाई कर्मचारियों की 1834 की हड़तालों का ज़िक्र किया है। इस पुस्तक से ज़ाहिर है कि सफाई कर्मचारियों की हड़ताल से वे परेशान थे। परन्तु गांधीजी जो सिविल नाफ़रमानी, हड़तालों और भूख हड़ताल का अपने राजनीतिक कार्य तथा अछूतों के अधिकारों के विरूध्द इस्तेमाल करते रहे थे, भंगियों की हड़ताल के बड़े विरोधी थे।

1945 में बंबई लखनउ आदि कई बड़े शहरों में एक बहुत बड़ी हड़ताल सफाई कामगारों ने की। यदि गांधीजी चाहते तो इन कामगारों का समर्थन कर हड़ताल ज़ल्द समाप्त करवाकर इस अमानवीय कार्य में भंगियों को कुछ सुविधा दिलवा सकते थे किन्तु उन्होंने उल्टे अँगरेज़ सरकार का समर्थन करते हुए हड़ताल की निन्दा की । इस संबंध में एक लेख में वे लिखते है- सफाई कर्मचारियों की हड़ताल के ख़िलाफ़ मेरी राय वही है जो 1897 में थी जब मै डरबन (द-अफ्रीका) में था। वहाँ एक आम हड़ताल की घोषणा की गयी थी। और सवाल उठा कि क्या सफाई कर्मचारियों को इसमें शामिल होना चाहिए, मैंने अपना वोट इस प्रस्ताव के विरोध में दिया।

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इसी लेख में वे बंबई में हुए हड़ताल के बारे में लिखते है- विवादों के समाधान के लिए हमेशा एक मध्यस्थ को स्वीकार कर लेना चाहिए। इसे अस्वीकार करना कमज़ोरी की निषानी है। एक भंगी को एक दिन के लिए भी अपना काम नहीं छोड़ना चाहिए। न्याय प्राप्त करने के और भी कई तरीक़े उपलब्ध है। यानी भंगियों को न्याय प्राप्त करने के लिए हड़ताल करना महात्मागांधी की दृष्टि में अवैध है।

गांधीजी मानते है कि भारत में रहने वाला व्यक्ति हिन्दू या मुसलमान, ब्राम्हण या शूद्र नहीं होगा, बल्कि उसकी पहचान केवल भारतीय के रूप में होगी। लेकिन वास्तविकता यह है कि वर्ण व्यवस्था की जड़ पर कुठाराघात किये बिना अस्पृश्यता को दूर करने का प्रयत्न रोग के केवल बाहरी लक्षणों की चिकित्सा करने के समान है। छुआछूत या अस्पृष्यता और जातिभेद को मिटाने के लिए शास्त्रों की सहायता ढूँढना ज़रूर कहा जाएगा कि जब जक हिन्दू समाज में वर्ण विभाजन विद्यमान रहेगी तब तक अस्पृश्यता के निराकरण की आशा नहीं की जा सकती। अतः वर्ण व्यवस्था में नई पीढ़ी की आस्था एवं श्रध्दा समाप्त करना हिन्दू समाज की मौलिक आवश्यकता है।

इस व्यवस्था के औचित्य के लिए शास्त्रों का प्रमाण प्रस्तुत करना उचित नहीं। अम्बेडकर ने कहा-शास्त्रों के आदेशों के कारण ही हिन्दू समाज में वर्ण विभाजन बना हुआ है जिसने हिन्दुओं में ऊँच-नीच की भावना उत्पन्न की है, जो अस्पृश्यता का मूल कारण है। स्पष्ट है आधुनिक युग में वर्ण विभाजन के आधार पर हिन्दू समाज का संगठन उचित प्रतीत नहीं होता।

डॉ-अंबेडकर इस बारे में आगे कहते हैं- हिन्दू समाज को ऐसे धार्मिक आधार पर पुनः संगठित करना चाहिए जो स्वतंत्रता, समता और बन्धुता के सिध्दान्त को स्वीकार करता हो। इस उद्देश्य की प्राप्ति को लिए जाति भेद और वर्ण की अलंध्यता तभी नष्ट की जा सकती है, जब शास्त्रों को भगवद मानना छोड़ दिया जाय।

आख़िर में यही कहा जा सकता है कि दलित संदर्भ में गांधी के विचार प्रासंगिता की कसौटी पर कई प्रश्न चिन्ह खड़े करते हैं। बहुत अच्छा होता यदि महात्मा गांधी अन्य मामले की तरह दलित समस्याओं को भी प्राकृतिक न्याय की कसौटी में कस कर देखते। तथा सभी को उच्च कोटि के व्यवसाय अपनाने की आज्ञा देते। समाज में उच्च कोटि तथा निम्न कोटि के व्यवसाय दोनों की ज़रूरत समान रूप से है। फिर इनके पुश्तैनी स्वरूप को बदलने की आज़ादी गांधी क्यों नहीं देतें, क्यों उच्च जातियों के पेशे आरक्षित करने का पक्ष लेते हैं, आख़िर श्रेष्ठता का सीधा संबंध संलग्न व्यवसाय से ही है । इसकी स्वतंत्रता के बिना समाज में समानता की कल्पना करना हास्यास्पद प्रतीत होता है।

संदर्भ ग्रंथ-

- महात्मा गांधी यंग इन्डिया 29-12-1920

पृष्ठ 122, 123, 125 गांधी-सामाजिक राजनेतिक परिर्वतन लेखक डा-हरिष कुमार प्रकाषक-अर्जुन पब्लिशंगग हाउस नई दिल्ली-2पृष्ठ क्रमांक 102,महात्मा-तेन्दुलकर, जी-डी- भाग-3 पब्लिकेशन डिवीजन भारत सरकार नई दिल्लीमहात्मा गांधी यंग इन्डिया 17,जुलाई 1925पृष्ठ क्र- 27, 31 बाबा साहब भीमराव अंबेडकर और भंगी जातियाँ, भगवान दास प्र- दलित टुडे प्रकाशन, लखनऊ-226016Removal of Untochability by M-K-Gandhi, Harijan, 21-4-46

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