नया साल किसने बनाया और कैसे ?

नया साल किसने बनाया और कैसे ?

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हिन्दू केलिन्डर vs gregorian केलिन्डर

दोस्तों हर साल आपको, एक हि साल में, कई बार, कुछ सन्देश मिलते होंगे, की ये नया साल मनाओ वो नया साल मनाओ… लेकिन ज्यादा कुछ पता नहीं चलता होगा की कौन कब क्यूँ कोई अलग हि नया साल मना रहा होता है..
 
आखिर है क्या नया साल ?
नया साल किस दिन आता है ?
आखिर नया साल कब से मनाया जा रहा है ?
क्या नया साल शुरू से 1 January से हि मनाया जाता रहा है ?
नया साल कैसे बना 1 जनवरी ?
नया साल रात को १२ बजे क्यूँ शुरू माना जाता है ?
 
जब हम इन सभी सवालों के जवाब ढूंढने चलते हैं तो हमको कुछ और सवालों के जवाब भी मिलते हैं जो आज के ज़माने में बहुत हि कम लोग जानते हैं, जैसे :-
 
एक साल में 365 दिन हि क्यूँ ?
एक साल में 12 महीने हि क्यूँ ?
एक महीने में 30 – 31 दिन हि क्यूँ ?
एक हफ्ते में सात दिन हि क्यूँ ?
एक दिन में 24 घंटे हि क्यूँ ?
सात दिनों के नाम कैसे पड़े ?
12 महीनों के नाम कैसे पड़े ?
फरवरी 28 दिन का हि क्यूँ ?
जुलाई और अगस्त लगातार 31 दिन के हि क्यूँ ?
अप्रैल फूल 1 अप्रैल को कब से मनाया जाता है ?अप्रैल फूल कैसे शुरू हुआ और क्यूँ ?
क्यूँ ज्यादातर विश्व का वित्तीय वर्ष 1 अप्रैल से शुरू होता है ?
 
ऐसे कई रोचक सवाल हैं जिनका जवाब आपके अंग्रेजी स्कूल के teachers के पास भी नहीं मिलेगा. आप चाहे तो उनसे जानने की कोशिश कर सकते हैं … कोई विरला हि होगा जो इन सवालों के जवाब दे पायेगा ..आइये शुरू करते हैं अपनी ज्ञान यात्रा.
आपने शायद ये तो सुना हि होगा की हिन्दू सनातन धर्म को सारा विश्व सबसे पुराना मानता है. अगर आपने अभी तक ऐसा नही सुना तो जान लीजिये की विश्व के बड़े जाने माने नाम भारत के बारे में क्या बोलकर गए हैं .. http://www.bharatsamachaar.com/2014/12/famous-quotes-on-hinduism.html
 
इसी हिन्दू सनातन धर्म से निकला सबसे पहला (कुछ देर के लिए मान लीजिये, साबित थोड़ी देर में हो जायेगा) केलिन्डर. जो की पूर्णतः गृह नक्षत्रों के आधार और उनकी स्तिथि व दिशा के आधार पर बनाया गया था. उदाहरण के लिए दिवाली हर साल अमावस की रात को होती है लेकिन दिवाली की कोई निश्चित तारीख अंग्रेजी केलिन्डर में फिक्स नहीं होती यानि दुसरे शब्दों में अगर दिवाली ३ नवम्बर २०१४ को अमावस थी तो ३ नवम्बर २०१५ को अमावस नही होगी. ऐसा इसलिए की हिन्दू केलिन्डर पुर्णतः गृह और नक्षत्रों के आधार पर बनाया गया, जबकि अंग्रेजी केलिन्डर की शुरुआत भारतीय हिन्दू केलिन्डर की नकल से बनाया गया (कुछ देर में ये बात साबित हो जाएगी).
Earth
1 साल में 365 दिन क्यूँ होते हैं ? 365 दिन में पृथ्वी सूर्य की सम्पूर्ण परिक्रमा करती है. (365.25 दिन जो चार साल में .२५*४ होने से 366 बन जाता है)
 
1 साल में १२ मास (महीने) क्यूँ ? हिन्दू केलिन्डर नक्षत्रों पर आधारित है, चंद्रमा हर महीने पूर्ण रूप से खत्म (अमावस) व् पूर्ण स्वरुप (पूर्णिमा) में दिखाई देता है. इस नए चंद्रमा के बनने की शुरुआत से लेकर अगली नयी शुरुआत तक के समय को चन्द्रमा का एक चक्र कहते हैं. हिन्दू केलिन्डर में हर मास की तारीख इस तरह से होती हैं,  
शुकल पक्ष की एकम, द्वितीय, तृतीया चतुर्थी,पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, पूर्णिमा (15 वा दिन),
फिर से एकम लेकिन अब चन्द्र घटना शुरू होगा अर्थात काला होने लगेगा तो कृष्ण पक्ष की एकम ,द्वितीय, तृतीया चतुर्थी,पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, अमावस्या (30 वा दिन). इसी प्रकार 1 मास को ३० दिन में बांटा गया.
लेकिन उस समय के विज्ञानं के अनुसार (करोड़ो लाखों वर्षों पूर्व) यह चक्र ३० व् ३१ दिन का माना जाता था. तो उसी के अनुसार पहले महीने में ३१ दिन, दुसरे में ३०, तीसरे में ३१ इस तरह से केलिन्डर बनाया गया.
 
नतीजा क्या हुआ ३१+३०+३१+३०+३१+३०+३१+३०+३१+३०+३१ ऐसे पुरे ग्यारह महीने तो बन गए लेकिन क्यूंकि साल में 365 दिन हि होने थे तो बाकी बचे दिन सिर्फ २९ जो की आखरी महीने में रखे गए जैसा की स्वाभाविक भी है की बैलेंसिंग figure आखरी में डाला जाता है. (365-३३६ दिन = २९ दिन)
अब ये सोचने वाली बात है की आखरी महिना तो दिसम्बर होता है (आज के अंग्रेजी केलिन्डर के अनुसार ) लेकिन दिसम्बर तो पुरे ३१ दिन का होता है. तो इसको समझिये,
 
हुआ यूँ की पुराना हिन्दू केलिन्डर जो शुरू होता था आज के 1 मार्च से. (मुझे मालूम है आप कहेंगे 1 अप्रैल लेकिन ऐसा बाद मे हुआ, पहले 1 मार्च से था उसके बाद 1 अप्रैल से हुआ). 1 मार्च अंग्रेजी केलिन्डर का तीसरा महिना होता है, जबकि कुछ समय पहले तक हिन्दुओ का पहला महिना होता था.
यानि पहला महिना अगर march है तो आखरी महिना February हुआ. जो आज के केलिन्डर से सिर्फ थोडा सा अलग है जिसका एक और कारण है.
पहले देखिये march ३१ का पहला महिना
अप्रैल ३०
मई ३१
जून ३०
जुलाई ३१
 
अगस्त ३० का होता था लेकिन आज ३१ है क्यूंकि एक राजा ऑगस्टस के नाम पर ये महिना रखा था (हिन्दुओ ने नही, बाद के अंग्रेजो ने क्यूंकि हम आज के केलिन्डर के अनुसार नाम पढ़ रहे हैं). निचे दिया गया है की august 6 month था जो ३१ का सिर्फ इसलिए किया गया क्यूंकि राजा को लगता था उसके नाम के महीने में 1 दिन कम क्यूँ हो. ऐसा करने के लिए अगले सभी महीनों को छेड़ा गया, सितम्बर जो ३१ का होना चाहिए था वो सिर्फ ३० का कर दिया गया, अक्टूबर को ३० की जगह ३१, नवम्बर को ३०, दिसम्बर को ३१, January को ३१ का हि रखा गया और 1 दिन February से कम कर दिया गया २९ की जगह २८ यानि फिर से बैलेंसिंग figure. January को भी ३१ बाद में सिर्फ इसलिए किया गया की ये पहला महिना घोषित किया गया था (बाद में जो की आज का मौजूद केलिन्डर है)
 
Augustus for ‘August’
After Julius’s grandnephew Augustus defeated Marc Antony and Cleopatra, and became emperor of Rome, the Roman Senate decided that he too should have a month named after him. The month Sextillus (sex = six) was chosen for Augustus, and the senate justified its actions in the following resolution:
Whereas the Emperor Augustus Caesar, in the month of Sextillis . . . thrice entered the city in triumph . . . and in the same month Egypt was brought under the authority of the Roman people, and in the same month an end was put to the civil wars; and whereas for these reasons the said month is, and has been, most fortunate to this empire, it is hereby decreed by the senate that the said month shall be called Augustus.
Not only did the Senate name a month after Augustus, but it decided that since Julius’s month, July, had 31 days, Augustus’s month should equal it: under the Julian calendar, the months alternated evenly between 30 and 31 days (with the exception of February), which made August 30 days long. So, instead of August having a mere 30 days, it was lengthened to 31, preventing anyone from claiming that Emperor Augustus was saddled with an inferior month.
To accommodate this change two other calendrical adjustments were necessary:
The extra day needed to inflate the importance of August was taken from February, which originally had 29 days (30 in a leap year), and was now reduced to 28 days (29 in a leap year).
Since the months evenly alternated between 30 and 31 days, adding the extra day to August meant that July, August, and September would all have 31 days. So to avoid three long months in a row, the lengths of the last four months were switched around, giving us 30 days in September, April, June, and November.
Among Roman rulers, only Julius and Augustus permanently had months named after them—though this wasn’t for lack of trying on the part of later emperors. For a time, May was changed to Claudius and the infamous Nero instituted Neronius for April. But these changes were ephemeral, and only Julius and Augustus have had two-millenia-worth of staying power.
For further reading:
Calendar: Humanity’s Epic Struggle to Determine a True and Accurate Year, David Ewing Duncan (New York: Avon, 1998).
 
Read more: August—History of the Month’s Origin | Infoplease.com http://www.infoplease.com/spot/history-of-august.html#ixzz3August Month Facts
 
अब आते हैं महीनो के नाम पर. जैसा की आपको पहले बताया की अंग्रेजो ने भारतीय केलिन्डर की नकल की थी, उसका सबूत आज भी मौजूद है.
 
सप्त अम्बर  जो की 7 नंबर है वो आज के अंग्रेजी केलिन्डर का 9 वा महिना है.
अष्ट अम्बर 8 था, वो 10 वा महिना है.
नव अम्बर 9 था, आज 11 वा महिना है.
दश अम्बर 10 था, आज १२ वा महिना है.
 
सितंबर, अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर क्रम से 7वाँ, 8वाँ, नौवाँ और दसवाँ महीना होना चाहिए जबकि ऐसा नहीं है। ये क्रम से 9वाँ, 10वाँ, 11वां और बारहवाँ महीना है। हिन्दी में सात को सप्त, आठ को अष्ट कहा जाता है,इसे अङ्ग्रेज़ी में sept (सेप्ट) तथा oct (ओक्ट) कहा जाता है। इसी से september तथा October बना। नवम्बर में तो सीधे-सीधे हिन्दी के “नव” को ले लिया गया है तथा दस अङ्ग्रेज़ी में “Dec” बन जाता है जिससे December बन गया। ऐसा इसलिए कि 1752 के पहले दिसंबर दसवाँ महीना ही हुआ करता था। 
 
इसका एक प्रमाण और है। जरा विचार करिए कि 25 दिसंबर यानि क्रिसमस को X-mas क्यों कहा जाता है???? इसका उत्तर ये है की “X” रोमन लिपि में दस का प्रतीक है और mas यानि मास अर्थात महीना। चूंकि दिसंबर दसवां महीना हुआ करता था इसलिए 25 दिसंबर दसवां महीना यानि X-mas से प्रचलित हो गया।
 
अब आते हैं एक हफ्ते में सात दिन हि क्यूँ ?
उस प्राचीन काल में 7 (1 सूर्य 1 चन्द्र और 5 ग्रहों को मिलाकर) ये 7 हि पृथ्वी से आँखों से सीधे देखे जा सकते हैं. (बाकी गृह को देखने के लिए दूरबीन की आवश्यकता पड़ेगी)
पृथ्वी से उत्तरोत्तर दुरी के आधार पर ग्रहों का क्रम निर्धारित किया गया जैसे शनि, गुरु, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध और चन्द्रमा. इनमे चंद्रमा पृथ्वी के सबसे पास है तो शनि सबसे दूर, इसमें एक एक गृह दिन के २४ घंटो में 1 -1 घंटे का अधिपति रहता है, अतः क्रम से सातों गृह 1-1 घंटे अधिपति बनते हैं, यह चक्र चलता रहता है, और 24 घंटे पुरे होने के बाद जो 25 वे घंटे का अधिपति होता है उसी के नाम से दिन का नाम होता है. सूर्य से सृष्टि शुरू हुई इसलिए पहला दिन रवि वार यानी सूर्य का दिन.
 
सूर्य पहले घंटे का अधिपति, उसके बाद शुक्र, बुध, चन्द्र, शनि, गुरु, मंगल.
8, 15, 22 का अधिपति भी सूर्य हि हुआ, २३ का शुक्र, 24 का बुध और २५ का चन्द्रमा, क्यूंकि एक दिवस में 24 हि घंटे होते हैं (क्यूंकि पृथ्वी अपनी धुरी का एक चक्कर 24 घंटे में पूर्ण करती है), तो 25 वा अधिपति अगले दिन का नाम होता है, जो की चंद्रमा हुआ, सोम माने चन्द्र. इसी क्रम को जब आप आगे बढ़ाएंगे तो मंगल, बुध, ब्रहस्पति (गुरु), शुक्र, शनि आएगा.
 
अब एक और नमूना देखिये अंग्रेजो की नक़ल बिना अक्ल का.
उन्होंने Sunday हमसे चुराया, सूर्य या रवि वार,
Monday जो की moon से है, यानि चंद्रमा, यानि सोम
Tuesday जिसका कोई अर्थ नही है ? मंगल गृह को अंग्रेज mars कहते हैं लेकिन tues क्या है ये तो वो बेचारे भी नहीं जानते. आखिर किस आधार पर उन्होंने ये नाम रखा..
इसी तरह Wednesday जो की हिन्दुओ में बुध गृह है लेकिन wednes के नाम से अंग्रेजी में कोई गृह ?? आपने सुना क्या ?
Thursday भी उसी तरह से
Friday भी
Saturday हमसे हि लिया हुआ है, शनि याने Saturn गृह.
 
अब बात रही अप्रैल से शुरू होने वाले वित्तीय वर्ष की
क्यूंकि जब से बहीखाते या यूँ कहें की व्यापर जगत शुरू हुआ तब से हि पहला मास 1 अप्रैल से माना जाता रहा है. जो उससे पहले कभी 1 march (आज के केलिन्डर अनुसार) हुआ करता था. वो प्रथा सम्पूर्ण विश्व में आज भी देखने को मिलती है जिसको आप और हम सब financial year के नाम से जानते हैं असल में वोही हिन्दू केलिन्डर है.
 
अप्रैल फूल क्या है और क्यूँ मनाया जाता है और कब से ?
New Year’s Day Moves
Ancient cultures, including those of the Romans and Hindus, celebrated New Year’s Day on or around April 1. It closely follows the vernal equinox (March 20th or March 21st.) In medieval times, much of Europe celebrated March 25, the Feast of Annunciation, as the beginning of the New Year.
 
In 1582, Pope Gregory XIII ordered a new calendar (the Gregorian calendar) to replace the old Julian calendar. The new calendar called for New Year’s Day to be celebrated Jan. 1. That year, France adopted the reformed calendar and shifted New Year’s Day to Jan. 1. According to a popular explanation, many people either refused to accept the new date, or did not learn about it, and continued to celebrate New Year’s Day on April 1. Other people began to make fun of these traditionalists, sending them on “fool’s errands” or trying to trick them into believing something false. Eventually, the practice spread throughout Europe. The Gregorian calendar was adopted by England in 1752.
 
1582 में एक चर्च के पादरी ने कहा की 1 January से नया साल शुरू होगा, न कोई कारण न कोई तथ्य बस उसका मन किया और उसने ऐसा कर दिया, नतीजा महीनों के नाम उलटे सीधे हो गए. और वो यहाँ तक भी नही रुका, उसने हिन्दू केलिन्डर मानने वालों को मुर्ख कहना शुरू किया और उस दिवस का नाम मुर्ख दिवस भी खोषित किया. इसी कारण से हिन्दू नव वर्ष की जब शुरुआत होती है तब पूरा विश्व (चर्च व् ईसाईयों के गुलामों द्वारा प्रचारित व् प्रताड़ित ) मुर्ख दिवस मनाता है. शर्म तो तब आती है जब खुद हिन्दू लोग एक दुसरे को अज्ञानता या सच में मूर्खतावश अप्रैल fool मनाते हैं.

An Interesting History of the Year 1752.

Also Read:  मातृ दिवस इसका इतिहास और सामाजिक औचित्य !
Jun 9th – French army surrenders to the British in Trichinopoly India
Sep 1st – Liberty Bell arrives in Phila
Sep 2nd – Last Julian calendar day in Britain and British colonies (no Sept 3-Sept 13th)
Sep 3rd – Britain and the British Empire (including the American colonies) adopt the Gregorian Calendar, losing 11 days. People riot thinking the government stole 11 days of their lives
Sep 14th – Britain (and American colonies) adopt Gregorian calendar (no Sept 3-Sept 13th)
Here is an interesting historical fact that you probably didn´t know.

Just have a look at the calendar for the month of September 1752.If you think I´m joking, you may search it on Google and see it for yourself  http://www.timeanddate.com/calendar/?year=1752&country=1

In case you haven´t noticed, 11 days are simply missing from the month.

Here´s the explanation: This was the month during which England shifted from the Roman Julian Calendar to the Gregorian Calendar.

A Julian year was 11 days longer than a Gregorian year. So, the King of England ordered 11 days to be wiped off the face of that particular month. (A King could order anything, couldn´t he?).

So, the workers worked for 11 days less that month, but got paid for the whole month. That´s how the concept of “paid leave” was born. Hail the King!!!

In the Roman Julian Calendar, April used to be the first month of the year; but the Gregorian Calendar observed January as the first month.

Even after shifting to the Gregorian Calendar, many people refused to give up old traditions and continued celebrating 1st April as the New Year´s Day.

Also Read:  हिन्दू नव वर्ष को जानिए

When simple orders didn´t work, the King finally issued a royal dictum; which stated that those who celebrated April 1st as the New Year´s Day would be labelled as fools.

From then on, April 1st became April Fool´s Day.

History is really interesting, isn´t it?

 
अब सब से आखरी और अहम सवाल
नव वर्ष का अर्थ क्या है ? कौन कौन किस दिवस को नव वर्ष मनाता है और क्यूँ ?
 
नव का अर्थ है नया. हम सब प्रकृति के द्वारा निर्मित हैं, सिर्फ मानव हि नहीं, वृक्ष, मौसम, वातावरण. हिन्दू समाज की ज्यादातर बातें वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित थी, उनके नव वर्ष को हि देख लीजिये. आज के सन्दर्भ में बात करें तो 1 अप्रैल अंग्रेजी केलिन्डर का हिन्दुओ का नव वर्ष है. ऐसा क्या नया होता है उस वक़्त ?
क्या आपने कभी उस समय में प्रकृति को देखा है ? सभी वृक्ष अपने पुराने पत्ते छोड़कर (पतझड़ में ) नए पत्तो का निर्माण करते हैं यानि 1 वर्ष पूर्ण हुआ अब नए पत्तों का जन्म हुआ.
उसी प्रकार कृषि में भी गेहूं अनाज की फसल काट कर नया गेहूं घर में आता था. गेहूं जो मुख्य भोजन है हिन्दू सनातन्धर्मियों का
येही मुख्य कारण है की किसी को भी बताने की जरूरत नही की नया वर्ष कब शुरू होगा,
कोई भी व्यक्ति चंद्रमा को देखकर उस दिवस का अंदाजा, ऋतू को देखकर मास का अंदाजा सहज हि लगा सकता था.
लेकिन आज का मानव इस पश्चिमी अज्ञानता व् मुर्खता में अपने प्राकृतिक शक्तियों का ज्ञान भी नहीं रख पा रहा है.
हिन्दू पंचांग हिन्दू समाज द्वारा माने जाने वाला कैलेंडर है। इसके भिन्न-भिन्न रूप मे यह लगभग पूरे नेपाल और भारत मे माना जाता है। पंचांग (पंच + अंग = पांच अंग) हिन्दू काल-गणना की रीति से निर्मित पारम्परिक कैलेण्डर या कालदर्शक को कहते हैं। पंचांग नाम पाँच प्रमुख भागों से बने होने के कारण है, यह है- तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। इसकी गणना के आधार पर हिंदू पंचांग की तीन धाराएँ हैं- पहली चंद्र आधारित, दूसरी नक्षत्र आधारित और तीसरी सूर्य आधारित कैलेंडर पद्धति। भिन्न-भिन्न रूप में यह पूरे भारत में माना जाता है।
एक साल में १२ महीने होते हैं। प्रत्येक महीने में १५ दिन के दो पक्ष होते हैं- शुक्ल और कृष्ण। प्रत्येक साल में दो अयन होते हैं। इन दो अयनों की राशियों में २७ नक्षत्र भ्रमण करते रहते हैं। १२ मास का एक वर्ष और ७ दिन का एक सप्ताह रखने का प्रचलन विक्रम संवत से शुरू हुआ। महीने का हिसाब सूर्य व चंद्रमा की गति पैर रखा जाता है। यह १२ राशियाँ बारह सौर मास हैं। जिस दिन सूर्य जिस राशि मे प्रवेश करता है उसी दिन की संक्रांति होती है। पूर्णिमा के दिन चंद्रमा जिस नक्षत्र मे होता है उसी आधार पर महीनों का नामकरण हुआ है। चंद्र वर्ष, सौर वर्ष से ११ दिन ३ घड़ी ४८ पल छोटा है। इसीलिए हर ३ वर्ष मे इसमे एक महीना जोड़ दिया जाता है जिसे अधिक मास कहते हैं।
 
प्राचीन काल में अंग्रेज़ भारतीयों के प्रभाव में थे इस कारण सब कुछ भारतीयों जैसा ही करते थे और इंगलैण्ड ही क्या पूरा विश्व ही भारतीयों के प्रभाव में था जिसका प्रमाण ये है कि नया साल भले ही वो 1 जनवरी को मना लें पर उनका नया बही-खाता 1 अप्रैल से शुरू होता है। लगभग पूरे विश्व में वित्त-वर्ष अप्रैल से लेकर मार्च तक होता है यानि मार्च में अंत और अप्रैल से शुरू। भारतीय अप्रैल में अपना नया साल मनाते थे तो क्या ये इस बात का प्रमाण नहीं है कि पूरे विश्व को भारतीयों ने अपने अधीन रखा था। इसका अन्य प्रमाण देखिए-अंग्रेज़ अपना तारीख या दिन 12 बजे रात से बदल देते है। दिन की शुरुआत सूर्योदय से होती है तो 12 बजे रात से नया दिन का क्या तुक बनता है!!! भारत में नया दिन सुबह से गिना जाता है, सूर्योदय से करीब दो-ढाई घंटे पहले के समय को ब्रह्म-मुहूर्त्त की बेला कही जाती है और यहाँ से नए दिन की शुरुआत होती है। यानि की करीब 4 – 4.30 के आस-पास और इस समय इंग्लैंड में समय 12 बजे के आस-पास का होता है। चूंकि वो भारतीयों के प्रभाव में थे इसलिए वो अपना दिन भी भारतीयों के दिन से मिलाकर रखना चाहते थे इसलिए उनलोगों ने रात के 12 बजे से ही दिन नया दिन और तारीख बदलने का नियम अपना लिया ।
 
जरा सोचिए वो लोग अब तक हमारे ज्ञान के अधीन थे, हमारा अनुसरण करते थे, और हम सर्वगुण संपन्न होते हुए भी, उनकी ओर देखते हैं, उनका अनुसरण करते हैं ! कितनी बड़ी विडम्बना है ये ! ये सब हमारे द्वारा हमारे शास्त्रों की उपेक्षा का परिणाम है !
आप कोई भी नव वर्ष मनाएं लेकिन सत्य और ज्ञान को जरुर जाने और उसकी शिक्षा अपने बच्चों को भी दें ताकि वो अंधभक्त न बनें.
क्या भारत का विज्ञानं इतना विकसित नहीं था की उसने सात दिनों के नाम को सातों ग्रहों की दुरी के अनुसार क्रमबद्ध करके रखा ?क्या ग्रहों की दुरी का पता लगाना विज्ञानं की उच्च तकनिकी को नहीं दर्शाता ? उस समय भी ऐसे यंत्र विकसित रहे होंगे जिनके आधार पर ये लघु से लघु गणना की गयी और बहुत हि वैज्ञानिक पद्दति से हिन्दू केलिन्डर का निर्माण किया गया.
एक आखरी उदाहरण हनुमान चालीसा जी से
युग सहस्त्र योजन पर भानु
लील्यो ताहि मधुर फल जानू
युग माने १२००० साल
सहस्त्र माने १०००
योजन माने 8 मील यानि १३ किलोमीटर लगभग
इतनी दुरी पर भानु यानि सूर्य था पृथ्वी से
इसकी गणना करें तो 15 करोड़ ६० लाख किलोमीटर आता है जो की आज के आधुनिक विज्ञानं से लगभग मिलता जुलता है. असली गणना हमारे प्राचीन विज्ञानं की सही है या आज के अंग्रेजी आधुनिक की , ये निर्णय मैं आप पर छोड़ता हूँ. लेकिन ये परम सत्य है की भारत विश्व गुरु था और उसके पतन का कारण उसी के अपने समाज के वो लोग हैं जो अज्ञानता के अन्धकार में भटक गए हैं. हमारी कोशिश है की हम उन्हें पुनः उनके उस शक्ति का स्मरण करवाएं और फिर से भारत को विश्व गुरु बनाये. क्यूंकि आज की मानवता की सभी समस्याओं की जड़ पश्चिम की वो आधुनिक सोच है जिसमे पैसा हि सब कुछ है.
 
कृपया आप हमारे इस लेख में कोई सुधार करना चाहे तो अवश्य भेजें.
 
अगर आपको लख सही लगे तो कृपया सब जगह इस लिंक का प्रचार करें ताकि जैसे आपको नया ज्ञान प्राप्त हुआ उसी प्रकार सम्पूर्ण मानव जाती को सत्य का ज्ञान प्राप्त हो और लोग स्वयं निश्चित करें की उन्हें नव वर्ष एक पादरी के कहने पर मनाना है या फिर किसी ठोस तथ्य के अनुसार.
 
आप किसी मुद्दे पर लेख भेजना चाहे तो हमे भेज सकते हैं, हम उसको जांच परखकर अपने इस साईट के माध्यम से सभी लोगों तक पहुँचाने की पूरी कोशिश करेंगे.
वन्दे मातरम 
नवनीत सिंघल
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