धर्म क्या और अधर्म क्या है ?

धर्म क्या और अधर्म क्या है ?

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वैसे तो यह बहुत बड़ा ग्रन्थ है की धर्म क्या है और अधर्म क्या है… लेकिन हाँ इन दोनों के बीच में कुछ अंतर जो साफ़ तौर पर आज के लोग पहचान कर सकते हैं वो बताता हूँ..उससे पहले कुछ भूमिका बांधनी होगी..
प्रकृति ने सभी जीवों को सब कुछ उनकी जरुरत के अनुसार दिया है..
जैसे पहाड़ पर रहने वाला कुत्ता, भैंस और ऊंट (उन सबको कुदरत ने बाल इतने खने दिए ताकि वो ठण्ड से बच सके) 
प्लेन इलाकों में उन खने बालों की जरुरत नहीं इसलिए वहां नहीं दिए, अगर दिए होते तो वो गर्मी से मरते.
एक और उदाहरण लेते हैं, सबसे बड़ा जीव हाथी लेकिन वो शाकाहारी है, उसके आगे आप मांस रख दीजिये वो भूखा मर जायेगा लेकिन खायेगा नहीं.. 
दूसरा जानवर शेर उसके सामने ख़ास रख दीजिये वो भूखा मर जायेगा लेकिन ख़ास नहीं खायेगा.. 
अब इन दोनों के शरीर को भी देखिये. जिसको मांसाहारी बनाया उसको नाख़ून और दांत दिए वो भी नुकीले ताकि उसको मांस को काटने में और खाने में दिक्कत न हो..लेकिन हाथी को न वो पंजे दिए न ही वो दांत…
तो इसका अर्थ यह हुआ की प्रकृति ने सबको जिस चीज की जरुरत है वो दी है खुद ब खुद…
अगर यह प्रकृति का सिद्धांत आप समझ गए तो आप मेरी आगे की बात भी आराम से समझ जायेंगे..
धर्म वो है जो प्रकृति के नियम से छेड़छाड़ न करे. दुसरे के हिस्से पर अपना अधिपत्य न करे. 
अगर कोई ऐसा करता है तो वो धर्म का उल्टा अधर्म है.. 
अगर आप सहमत हैं तो आगे पढ़ें..
अब देखते है मानव को.. भगवान् ने मानव को भी हर सजीव की तरह सब कुछ दिया है.. कुछ भी कम नहीं दिया.. जो मानव रेगिस्तान में रहते हैं, या बर्फ वाले शेत्र में रहते हैं उन सबमें थोड़ा अंतर किया लेकिन किसी भी मानव को चाहे वो पृथ्वी के किसी भी कोने में रहता हो, उसको न नुकीले नाख़ून दिए, न पैने दांत, और न ही मांस को पचाने वाली आंत…
अब आप कुतर्क कर सकते हैं की जो बेचारा बर्फ में रहता है अगर वो मांस नहीं खायेगा तो मर जायेगा… ये सही नहीं है.. इसको ऐसे समझिये काजू बादाम पिस्ता इत्यादि गरम वस्तुएं क्या आप गरम रेगिस्तान वाले इलाको में उगा सकते हैं या रोज खा सकते हैं ? अगर नहीं तो प्रकृति ने उनको उगाया ही उस जगह जिस जगह उसकी जरुरत है.. इनको खाकर जिन्दा नहीं बच सकते तो बताओ ?
आपका शरीर मांस खाने के लिए, जीव हत्या करने के लिए नहीं बनाया गया. लेकिन अगर आप ऐसा करते हैं तो आप प्रकृति के काम में बाधा उत्पन्न करते हैं.. किसी और का खाना आप खा रहे हैं तो दुसरे को उसकी कमी होगी, इस तरीके से पूरा चक्र प्रभावित होगा..
अब इससे यह समझे की जो यह काम करता है वो अधर्मी है… 
अब इसको समझते हैं धर्म के हिसाब से..
सनातन धर्म (हिन्दू, सिख, जैन और बौद्ध:- इस धर्म में कहीं पर भी ऐसी कोई बात नहीं आती की जीव हत्या करो या खाओ.. लेकिन कितने ही लोग इस काम को करते हैं, तो वो सभी लोग अधर्मी है.. उनके ऐसा करने से धर्म ऐसा नहीं हो जाता. सिर्फ वोही लोग अधर्मी हैं और हम उनको राक्षस कह सकते हैं.. राक्षस कोई भी अपने माथे पर लिखवा कर नहीं आता, राक्षस वो अपने कर्म से होता है.. 
मुस्लिम धर्म (सं 740 में) (उससे पहले यह क्या थे ये आप खुद सोचिये), इस धर्म में एक त्यौहार है बकरीद. यह धर्म में है.. ध्यान दीजियेगा… प्रकृति के खिलाफ इस धर्म में नियम है बलि का.. यह साबित करता है की ये मानवता की सबसे बड़ी भूल है की उन्होंने ऐसा धर्म बनाया जिसमे प्रकृति के खिलाफ काम किया गया.. मांस खाना धर्म के अन्दर होना सबसे बड़ी विकृति है.. मेरी नज़र में यह अधर्म है..
इसाई और यहूदी धर्म (2000 साल पुराना या 4000 साल पुराना) इनके धर्म का ज्यादा ज्ञान नहीं लेकिन इनके ज्यादातर लोग हर तरह के जीव को खाते हैं. जैसे मछली, केकड़ा, सूअर, गाय, भैंस, बकरा और न जाने क्या क्या… ये सब लोग भी अधर्मी हुए.. 
पहले के युग में राक्षस हुआ करते थे, जिनका वध सनातन धर्म के देवी देवता करते थे, सनातन धर्म अहिंसा का धर्म नहीं है… उसके देवी देवताओं के हाथ में हर तरह का हथियार  है. वो अधर्मियों का और राक्षसों का वध करते थे.. 
आज वो राक्षस कहाँ लुप्त हो गए.. उनके सींग होते थे, बदसूरत होते थे.. 
मेरी नज़र में वो राक्षस येही है.. राक्षस व्यक्ति कर्म से होता है…

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जिनके उलटे कर्मों से सम्पूर्ण पृथ्वी का चक्र खतरे में पड़ता हो, सिर्फ उनके स्वार्थ के लिए, उन लोगों को जीने का अधिकार कैसे हो सकता है… उन लोगों को ही राक्षस कहते थे.. ये राक्षस आज भी मौजूद हैं..

सनातन धर्म में भी राक्षस हैं..
बाकी धर्म की क्या कहें उन्हें जिस मानव ने बनाया उसने भी यह राक्षसी विचार धर्म में डाला जिससे उस धर्म के सभी राक्षस ही बने..आज के युग में आप आसानी से इन राक्षसों को पहचान सको, इसके लिए आपको यह समझाया..

यह मेरे विचार हैं.. हो सकता है आपको गलत लगे.. लेकिन अगर आप अपनी बात को सिद्ध कर सके तो हमारा भी ज्ञान बड़ेगा..
आपका आभार.

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