धर्मपाल जी एक सच्चे भारतीय

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नई दिल्ली में “धर्मपाल: समग्र लेखन” का लोकार्पण

अंग्रेजों ने भारत को प्रज्ञाहत करने का प्रयास किया

“आजादी के बाद भी “इण्डिया” “इण्डिया” ही रहा, भारत को कभी प्रधानता नहीं मिली।” यह कहना है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री कुप्.सी. सुदर्शन का। श्री सुदर्शन गत 21 दिसम्बर को नई दिल्ली में विख्यात गांधीवादी चिन्तक स्व. धर्मपाल द्वारा अंग्रेजी में लिखी गई पुस्तकों के हिन्दी अनुवाद “धर्मपाल : समग्र लेखन” का लोकार्पण करने के बाद अपने विचार व्यक्त कर रहे थे।

श्री सुदर्शन ने कहा कि भारत के जनमानस को समझने के लिए धर्मपाल जी ने गांवों का अध्ययन किया और उन्होंने पाया कि भारत दो हिस्सों में बंटा है- इण्डिया और भारत। इण्डिया की भावनाएं, इण्डिया की सोच और इण्डिया के विचार अंग्रेजी पढ़ा-लिखा वर्ग प्रदर्शित करता है। यह वर्ग सोचता है कि जो कुछ ज्ञान-विज्ञान है, वह पश्चिम की देन है। भारत के पास तो कुछ है ही नहीं। उन्होंने कहा कि हमारे यहां ऐसी सोच मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के कारण पैदा हुई। अंग्रेजों ने भारत के इतिहास को तोड़ने के भरसक प्रयत्न किए और भारत की प्रज्ञा को मारने की कोशिश की।

श्री सुदर्शन ने कहा कि अंग्रेज कहा करते थे कि भारत के पास जितनी भाषाएं हैं और जो साहित्य हैं उनमें काम की कोई बात है ही नहीं। यदि कुछ ज्ञान है भी तो वह यूरोप के किसी पुस्तकालय की एक आलमारी में समा जाने लायक है।

चीन की कथित प्रगति के संबंध में उन्होंने कहा कि हमारे यहां चीन-भक्तों की कमी नहीं है। ये लोग बात-बात पर चीन की प्रगति की दुहाई देते हैं। किन्तु चीन की असलियत कुछ और है। चीन के नगर तो बहुत साफ-सुथरे हैं और वहां ऊ‚ंची-ऊ‚ंची अट्टालिकाएं खड़ी हैं। किन्तु शहर से मात्र 10 कि.मी. की दूरी पर ही भयानक गरीबी दिखती है। सुबह मजदूरों को बसों पर बैठाकर बाहर से लाया जाता है और शाम को वहीं छोड़ दिया जाता है, ताकि ये मजदूर रात को नगर में न रहें और नगर साफ-सुथरे दिखें। श्री सुदर्शन ने पाञ्चजन्य के सम्पादक श्री तरुण विजय की पिछले वर्ष हुई चीन यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने चीन के बारे में कई लेख लिखे हैं जिनसे चीन की वास्तविक स्थिति उजागर होती है।

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श्री सुदर्शन ने कहा कि स्वराज्य प्राप्ति के बाद भारत में अनेक विद्वान हुए, उनकी प्रथम पंक्ति में धर्मपाल जी भी शामिल थे। उन्होंने विद्वानों का पुरोधा बनकर काम किया। उन्होंने अपने अध्ययनों से सिद्ध किया कि भारत समृद्ध था और इस कारण अंग्रेज यहां आए। समारोह की अध्यक्षता करते हुए निर्वासित तिब्बती सरकार के प्रधानमंत्री श्री सांमदोंग रिपोंछे ने कहा कि जगद्गुरु का दायित्व भारत के पास ही है, पर इसका बोध होना जरूरी है। यह बोध प्राप्त करने में धर्मपाल जी की पुस्तकें सहायक सिद्ध हो सकती हैं।

कार्यक्रम का आयोजन अखिल भारतीय साहित्य परिषद् ने किया था। इस अवसर पर कर्नाटक के पूर्व राज्यपाल श्री त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी, रा.स्व. संघ दिल्ली प्रान्त के संघचालक श्री रमेश प्रकाश, पूर्व संघचालक श्री सत्यनारायण बंसल, साहित्य परिषद् के अध्यक्ष डा. देवेन्द्र आर्य सहित अनेक गण्यमान्यजन उपस्थित थे। धर्मपाल समग्र का प्रकाशन अमदाबाद के पुनरुत्थान ट्रस्ट ने किया है। ट्रस्ट की सचिव श्रीमती इन्दुमती काटदरे ने बताया कि समग्र में 10 पुस्तकें हैं- “भारतीय चित्त, मानव एवं काल”, “18वीं शताब्दी में भारत में विज्ञान एवं तंत्रज्ञान”, “भारतीय परम्परा में असहयोग”, “18वीं शताब्दी में भारत में शिक्षा”, “पंचायत राज और भारतीय राज्यतंत्र”, “भारत में गोहत्या का अंग्रेजी मूल”, “भारत की बदनामी एवं दुरुपयोग”, “गांधी को समझें”, “भारत की परम्परा” और “भारत का पुनर्बोध”।

धर्मपाल जी ने इन सारी पुस्तकों की रचना अंग्रेजी में की थी। पुनरुत्थान ट्रस्ट ने पहले गुजराती और अब हिन्दी में इनका प्रकाशन किया है। इस समग्र की कीमत 2000 रुपए है। सम्पर्क:

पुनरुत्थान ट्रस्ट, वसुंधरा सोसायटी, आनंद पार्क, कांकरियाअमदाबाद-380028 (गुजरात)

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