डायन’ से डरे चर्च ने जिंदा जलाईं लाखों महिलाएं

डायन’ से डरे चर्च ने जिंदा जलाईं लाखों महिलाएं

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‘डायन’ से डरे चर्च ने जिंदा जलाईं लाखों महिलाएं

तारीख: 30 May 2015 13:53:00

 

 सतीश पेडणेकर
कुछ बरस पहले की बात है, मैं शिकागो में हुए एक पांथिक सम्मेलन की रपट पढ़ रहा था जिसमें पगान मतों के प्रतिनिधियों ने ईसाई मत  पर अनैतिक होने का आरोप लगाया था। उसकी एक वजह तो यह बताई थी कि ईसाई मत यह मानता है कि सत्य केवल उसके पास है। दूसरा कारण यह बताया था कि मध्य युग में ईसाइयत ने 90 लाख ‘चुड़ैलों’ की हत्या की थी। यह जानकारी और यह आंकड़ा मेरे लिए चौंकाने वाला था। मैंने जब इस बारे में जानने की कोशिश की तो पाया कि मध्ययुगीन यूरोप में पांच शताब्दियों तक ‘चुड़ैलों’ या ‘डायनों’ की हत्याएं करने और उन्हें जलाने की बात पूरी तरह सही है। पगान प्रतिनिधि द्वारा दिए गए ‘चुडै़लों’ की हत्या के आंकड़े को इसलिए अतिशयोक्तिपूर्ण कहा जा सकता है क्योंकि इस बारे में अब तकअधिकृत रिकार्ड उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह तो हकीकत है कि लाखों महिलाओं और पुरुषों को ईसाइयत ने ‘चुडै़ल’ या ‘ शैतान’ कह कर जला या मार डाला था।
सातवीं-आठवीं शताब्दी में यूरोप के लगभग सभी देशों में ईसाई मत राज-मत के रूप में स्थापित हो चुका था। हर मामले में चर्च की ही तूती बोलती थी। एक जमाना ऐसा था जब चर्च ‘चुडै़लों’ और ‘डायनों’ के अस्तित्व से ही इनकार करता था। लेकिन बाद में उसने अपनी इस सोच को बदल दिया। तेरहवीं शताब्दी में लोगों से कहा जाने लगा कि ईसाइयत जादू-टोने के खिलाफ है, इसे शैतान का कारनामा मानती है। इसलिए ‘चुडैलों’ को ‘शैतान’ की दासी के तौर पर चित्रित किया जाने लगा। आमतौर पर ऐसे चित्र बनने लगे जिनमें ‘चुडै़लों’ को अपनी वाहन झाड़ू पर बैठकर आसमान में उड़ते हुए दिखाया जाता। जादू-टोना करने वालों को कठोरतम दंड दिया जाता था। कई शताब्दियों तक अधिकतर ईसाई समाज यही मानता रहा कि ‘शैतान’ कुछ मनुष्यों या जीवों द्वारा अपना काम करवाता है। जल्द ही ‘शैतान’ की ताकत को कम करने या पूरी तरह समाप्त करने के लिए भी कुछ लोगों के खिलाफ कार्रवाई होने लगी। कुछ लोगों पर आरोप लगाया गया कि वे ‘शैतान’ की सेवक यानी ‘डायन’ हैं। यहां तक कि कुछ जानवरों तक पर इस तरह का आरोप लगा। इन लोगों व जीवों पर बाकायदा मुकदमा भी चला।
लेकिन ईसाई मत से पहले के मतों को मानने वाले लोग जबरन ईसाई बनाए जाने के बावजूद अपने परंपरागत कर्मकांड और  पांथिक अनुष्ठान करने से बाज नहीं आते थे। गांव, शहर में अनुष्ठान करना मुश्किल होता था तो वे किसी निर्जन स्थान पर चले जाते। जब पोप और पादरियों को उसका पता चला तो उन्होंने उसे भूत, पिशाच, डायन आदि की ‘शैतानी’ बताकर इसके समूल खात्मे  की अपील की। पोप इनोसेंट ने 1484 में डायनों के खिलाफ पंथादेश जारी किया। इस आदेश का पालन करने के नाम पर हजारों लोगों, जिनमें ज्यादातर स्त्रियां ही थीं, पर ‘डायन’ होने का आरोप लगाकर उनकी हत्या कर दी गई या उन्हें जला दिया गया। सन् 1645 से 1647 के बीच इंग्लैंड के ईस्ट एंग्लिया में मैथ्यू हॉपकिन्स नामक आदमी ‘डायनों’ को खोज निकालने के लिए ‘विच फाईंडर’ के नाम से कुख्यात था।  उसका दावा था कि शरीर पर खास तरह का निशान देखकर वह आसानी से किसी के ‘डायन’ होने का पता लगा सकता है। उसने सैकड़ांे लोगों को ‘पिशाच’ या ‘डायन’ कहकर मरवाया था। आखिर कोई महिला स्वयं को ‘डायन’ क्यों बताती, पर जरूरत से ज्यादा यातना देने के बाद वह उस घोर नारकीय यातना से बचने के लिए उस आरोप को कबूल कर लेती। ‘डायन’ या ‘चुड़ैल’ मानी गईं महिलाओं (या पुरुषों) को जिंदा जलाने के अलावा फांसी भी दी जाती। ‘डायन’ बताकर की जाने वाली हत्याएं केवल यूरोप तक ही सीमित नहीं रहीं। अमरीकी उपनिवेशों में भी निदार्ेष औरतों को ‘चुडै़ल’ बताकर मारा गया था। इतना ही नहीं, कई ईसाई ननों को ‘चुडै़ल’ बताकर सार्वजनिक रूप से उनका सिर कलम कर दिया गया।
यूरोप में काथार्स और नाइट टेम्पलर्स की समाप्ति के बाद ऐसे लोगों की खोज शुरू हुई जो ‘शैतान के सेवक’ थे। ऐसी महिलाओं को भी पकड़ा गया जो जादू-टोने या तंत्र-मंत्र में माहिर थीं। सच तो यह भी है कि यूरोप में ईसाई मत के फैलने से पहले ही डायनों और उन्हें खोजकर सजा देने का काम जारी था। कुछ महिलायें, जिन्हें डायन घोषित किया गया था, वे बेचारी प्राकृतिक चिकित्सा या जड़ी-बूटियों आदि के द्वारा इलाज करती थीं। अधिकतर गरीब, बेसहारा महिलाओं पर ही यह आरोप लगता था। ईसाई लोगों की नजर में इन महिलाओं का काम गैर-ईसाई और ‘घोर अपराध’ माना जाता था। इसलिये इनके अंगूठों को मोड़कर तोड़ दिया जाता या फिर नाखूनों को ही उखाड़ दिया जाता था। ‘डायन’ या ‘चुड़ैल’ मानी गईं महिलाओं (या पुरुषों) को जिंदा जलाने के अलावा फांसी भी दी जाती थी। लेखक जॉर्ज रिडली स्कॉट के अनुसार, जिस तरह का अत्याचार इन कथित डायनों पर किया गया उसकी मिसाल और कहीं नहीं मिलती। यह जरूरी नहीं था कि ‘डायन’ करार दिए गए लोगों में केवल महिलायें ही हों। आइसलैण्ड में ज्यादातर पुरुषों पर इस तरह के आरोप लगे थे। इंग्लैण्ड में कथित डायनों को सूली पर लटकाया जाता, पर यूरोप के अन्य देशों में इन्हें जिंदा जला देने का ही प्रचलन था। अफ्रीका में भी डायनों की खोज करवाई गई। कई बार तो लोगों का किसी पर’डायन’ होने के शक पर ही उसे पीट-पीटकर मार दिया गया था।  

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‘चुड़ैल’ घोषित होने के नाम पर महिलाओं को पकड़कर चर्च के पंथादेश के तहत केवल मृत्युदंड ही नहीं दिया जाता था वरन् यह जानने के लिए उसको तमाम तरह की निर्मम यातनाएं दी जाती थीं कि वे ‘चुडै़ल’ हैं या नहीं। इन यातनाओं से टूटकर ज्यादातर यह झूठा आरोप स्वीकार कर लेती थीं। इसके लिए कई तरीके अपनाए जाते थे। कथित डायन महिला को पहले निर्वस्त्र करके उसके अंग-प्रत्यगों पर कोई नुकीली चीज चुभाई जाती थी और शरीर को कई जगह से काट-काटकर देखा जाता था कि वह डायन है या नहीं। यदि चुभाने और चीरने से उसे दर्द नहीं होता था तो वह महिला ‘डायन’ मान ली जाती थी और उसकी हत्या कर दी जाती थी।
 शुरू-शुरू में तो चुभाने-चीरने पर महिला चिल्लाती थी, लेकिन कुछ समय बाद शरीर सुन्न पड़ जाने के कारण कराहना तक बंद  हो जाता था। इस हालत में भी उसे ‘डायन’ मान लिया जाता और सजा दी जाती। यातना का एक और तरीका बहुत प्रचलित था-महिला को निर्वस्त्र करके उसके दाहिने हाथ का अंगूठा बाएं पैर से और बाएं हाथ का अंगूठा दाहिने पैर से बांध दिया जाता। इसके बाद शरीर को रस्सी से बांधकर गहरे पानी में फेंक दिया जाता। पूरा शरीर बंधा होने के कारण महिला हाथ पैर मारने में अक्षम होती थी। अक्सर ऐसी हालत में शरीर पानी पर तैरता है। चर्च की मान्यता के अनुसार, अगर शरीर पानी में नहीं डूबता और पानी के ऊपर तैरता रहता है तो महिला ‘डायन’ मान ली जाती थी। ज्यादातर महिलाओं के पानी पर तैरते रहने के कारण उनको ‘डायन’ मानकर मौत की सजा दे दी जाती। ईसाई मत के शुरुआती काल से 18वीं शताब्दी तक शिक्षा पर चर्च का ही एकाधिकार था। चर्च ही स्कूल-कालेजों को संचालित करते थे। पढ़ाने का काम पादरी करते थे। दरअसल इस कारण ‘डायन’ और ‘चुडै़ल’ वाला अंधविश्वास लोगों में इतने गहरे तक फैल गया था कि 20वीं सदी के पूर्वार्ध तक इसके अवशेष मिलते हैं। यह सब कानूनी तरीके से होता था क्योंकि ‘चुडै़लों’ पर बाकायदा मुकदमे चलते थे। गवाह भी पेश करने पड़ते थे। बहुत से माता-पिताओं के खिलाफ उनके  बच्चों को ही गवाह के तौर पर पेश किया जाता था। उन्हें गवाही के लिए तैयार करने को यातनाएं दी जाती थीं। चर्च के लोग इन बच्चों के प्रति भी बहुत बर्बर थे।धीरे-धीरे समाज में ऐसा माहौल बन गया मानो दुनिया ‘शैतान की जागीर’ थी। इसमें होने वाले हर दुर्भाग्य के लिए ‘शैतान की दासी डायन’ को दोषी करार दिया जाता था क्योंकि ‘शैतान अपना काम डायनों के जरिये करता’ था। इन ‘डायनों’ को इस तरह से चित्रित किया जाता था मानो उनके पास ईसा से ज्यादा नहीं तो उसके बराबर शक्तियां हों। वे मरे हुए लोगों को जिंदा कर सकती थीं, पानी को शराब या दूध में बदल सकती थीं, भूतकाल और भविष्यकाल के बारे में जानती थीं, मौसम को बदल सकती थीं। ‘डायनांे’ को व्यापार में घाटे से लेकर मूड खराब होने तक हर चीज के लिए जिम्मेदार माना     जाता था।’
‘चुड़ैल’ और ‘डायन’ की आड़ में वैद्य और खासकर महिला वैद्य खासतौर पर निशाना बनीं। चर्च ने इन महिला वैद्यों को सबसे खतरनाक घोषित कर रखा था। चर्च ने जादू-टोने की परिभाषा में हर उस व्यक्ति को शामिल किया हुआ था जो इलाज के लिए जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करते थे। इसके अलावा जो उपचार करते थे उनकी इस क्षमता को जादू-टोने के साथ जोड़ दिया जाता था। ‘चुड़ैलों’ का पता लगाने वाले ‘विच हंटर’ वैद्यों और महिला वैद्यों के अलावा दाइयों को भी निशाना बनाते थे। रूढ़ीवादी ईसाई मानते थे कि बच्चे को जन्म देने से महिला और बच्चा, दोनों अपवित्र हो जाते थे। उन्हें पवित्र करने के लिए खास रस्म की जाती थी। दाई को प्रसूति के दर्द को कम करने के लिए कई तरह की जड़ी-बूटियों का पता होता था। इसे प्रसूति के दौरान होने वाले ईश्वर प्रदत्त दर्द पर सीधा हमला माना जाता था। चर्च की नजर में ईश्वर द्वारा ‘ईव’ को दिया गया दंड सभी महिलाओं पर लागू होता था इसलिए चर्च के अधिकारी मानते थे कि प्रसूति के दौरान होने वाले दर्द को कम करना महिलाओं को दिए गए आदम के अभिशाप को कम करने जैसा था। इस कारण शुरुआत में तो ‘क्लोरोफार्म’ का भी विरोध होता था।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                           
 इंग्लैंड में 20वीं सदी के पांचवें दशक में ‘डायनों’ को लेकर बना कानून खारिज कर दिया गया। सन् 1944 में श्रीमती हेलेन डंकल को ‘डायन’ होने के आरोप में गिरफ्तार कर उन पर मुकदमा चलाया गया तो अमरीका के उस वक्त प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने व्यंग्यपूर्ण निंदा करते हुए यह कानून रद्द कराया था। चर्च के डायन विरोधी रवैये का शिकार कई सुप्रसिद्ध महिलाएं भी हुईं। फ्रांस की सुप्रसिद्घ वीरांगना जॉन आफ आर्क (1412-31), जिसने इंग्लैंण्ड और फ्रांस के बीच 1337 से 1453 के मध्य हुए सौ से ज्यादा साल चले युद्ध में निर्णायक भूमिका निभाते हुए फ्रांस को विजय दिलाई थी, को विधर्मी और ‘चुडै़ल’ करार देकर पूर्वी फ्रांस के बुरगुंडी शहर के राउन बाजार में जिंदा जला दिया गया था। बुरगुंडी चर्च के उच्च अधिकारियों ने उसे बंदी बनाकर अंग्रेजों को बेच दिया था। हालांकि 1456 में चर्च ने अपनी इस घोषणा को वापस लिया और करीब पांच सौ वर्ष बाद सन् 1920 में चर्च ने उसे संत की पदवी दी। 

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