जीवन विद्या शिविर नोट्स दिवस 2

जीवन विद्या शिविर नोट्स दिवस 2

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​*2 जून 2017, दिवस् 2, जीवन विद्या शिविर 18, हापुड़, सोम भाई जी* नोट्स कॉपी नवनीत भाई 9560723234 
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पांचवी क्लास तक माता को बच्चे साद लेते हैं और दसवीं क्लास तक पिता को साध लेते हैं उसके बाद उसे यह समझ आ जाता है कि उसके परिवार के पास उसे देने के लिए सिवाय धन के कुछ है नहीं 
और वह स्वयं कर लेगा बल्कि जब धन भी कमाने कि उसकी योग्यता या समझ हो जाएगी तब वह उससे भी स्वयं ही कमा लेगा 
अब उसे परिवार की कोई आवश्यकता नहीं है 
क्या यह आपके परिवार के साथ हो रहा है ?
क्या यह आपने अपने परिवार के साथ किया था ?
क्या यही आपका बच्चा आपके साथ कर रहा है ?
दोषी कौन ??
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यात्रा किसी एक व्यक्ति की नहीं होती यह एक परिवार की होती है 
परिवार में *संबंध की वजह से समस्या है या फिर परिवार में *सुविधा* की वजह से समस्या है ?
 ज्यादातर लोग या लगभग सभी लोग इस बात से सहमत होंगे कि संबंध की वजह से समस्या उत्पन्न हो रही है .. 
आपको क्या लगता है ?
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जब हम छोटे थे तो हमसे कोई पूछे कि भाई आपके भाई बहन का नाम बताओ तो हम चाचा ताऊ मामा मौसी बुआ उनके सभी बच्चों के नाम जो कि हमारे कजन भाई बहन थे उन सभी के नाम बताते थे और मित्रों के नाम बताते थे .
 माता पिता ने हमें क्या सिखाया की सगे वाले जो होते हैं वही भाई बहन होते हैं बाकी सब तो पराए हैं 
क्या यह सही सिखाया गया या गलत सिखाया गया आप निर्णय कीजिए ..
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बच्चे को जिज्ञासा प्रश्नों के उत्तर से पूर्ण होगी या फिर बात को टरकाने से 
बच्चा न्याय चाहता है और हमने उसे क्या सिखाया प्रैक्टिकल होना , अन्यायी होना क्योंकि  प्रैक्टिकल में तो न्याय नहीं है , अन्याय क्योंकि वह प्रेक्टिकल नहीं लगता 
बच्चा चाहता है सही कार्य व्यवहार करना हम क्या सिखाते हैं गलत करना और सामने वाले को इसका एहसास भी ना हो ऐसा करना 
बच्चा सत्यवक्ता है सच बोलना चाहता है हमने क्या सिखाया झूठ बोलो और वह भी ऐसे कि चेहरे पर भाव से सामने वाला पकड़ ना पाए 
क्या हम ने सही किया क्या गलत किया निर्णय आप कीजिए ।।।
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लोहे की गाड़ी से हमारी पहचान है । हमारे पहने हुए कपड़े से हमारी पहचान है। 

 हमारे धन से हमारी पहचान है ।

हमारे पद से हमारी पहचान है ।
 हमारे रूप से हमारी पहचान है ।
क्या हमारी पहचान समझ से है ?

कि हम कितने सुखी हैं ?

कितने समझदार हैं ?

जो हम बोलते हैं वह करते हैं क्या इससे हमारी पहचान है ?

व्यक्ति को जो भी नया ज्ञान समझ मिलती है क्या वह उसे तुरंत अपनाएगा या जीवन में धीरे धीरे डालेगा ?
 लेकिन हमारी अपेक्षा क्या रहती है कि जो वह कह रहा है वह तुरंत अपना ले सौ प्रतिशत अपना ले और जब वह आपसे ऐसी उम्मीद करता तो आप कहते हो प्रैक्टिकल नहीं है तो होने क्या चाहिए ? 

सरल क्या है ? 

कि वह धीरे-धीरे बदले लेकिन बदले लेकिन हम उसे चाहते हैं कि वह तुरंत पूर्ण सौ प्रतिशत सुधर जाए .
क्या यह संभव है या असंभव है ? 
सोचकर देखिएगा ।।
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हमारे घर जब कोई व्यक्ति आता है तो हम क्या दिखाते हैं अपना घर अपना आडंबर अपनी गाड़ी अपनी चीजे जिनसे हमें लगता है कि हमें सम्मान मिलेगा 
ऐसे ही बच्चा हम से सीखता है और बच्चा जब बच्चे का तो कोई दोस्त आता है तो वह क्या दिखाता है वह अपने खिलौने अपनी वह चीज जिससे उसे लगता है कि उस को सम्मान मिलेगा वह सब प्रदर्शित करता है ।। 
क्या यह हमारे सम्मान के साधन हैं ?? 
हम किसे सम्मान देते हैं ? 
रूप के आधार पर 

बल के आधार पर 

धन के आधार पर या 

पद के आधार पर ।
उत्तर दीजिये ।। 
या कोई और आधार है जिस पर सम्मान टिका हुआ होना चाहिए ।।
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एक कार्य करके देखिए एक्सरसाइज कर सकते हैं 
2 से 3 साल के बच्चे को खाने की चीज दीजिए और दूसरे हाथ में ₹2000 का नोट दीजिए 
वह क्या choose करेगा ??

 खाने की चीज या 2000 का नोट
ज्यादातर लोग उत्तर देंगे कि खाने की चीज को वह स्वीकार करेगा नोट की उसे अभी समझ नहीं आई है 
यही काम आप 5 से 6 साल के बच्चे के साथ कीजिए आप पाएंगे अब बच्चे ने खाने की चीज को शायद ना स्वीकार कर के नोट को ही स्वीकार लिया है
 क्योंकि वह नोट को यानि अर्थ को यानि अर्थशास्त्र को समझ गया है और वह इस नोट का करेगा क्या ?
वह अपने मनपसंद की खाने की चीज उससे स्वयं ही खरीद लेगा 
समझ रहे हैं या नहीं बच्चा अर्थशास्त्र बचपन में ही सीख चुका है और किस से सीखा है ? 
आप ही के व्यवहार से , आपको देखकर क्योंकि आपने ही उसे सिखाया है कि धन ज्यादा कीमती है ज्यादा आवश्यक है भोजन से भी ..
कैसी लगती है वह स्वयं निरीक्षण कीजिए … 
 हमारा एक प्रस्ताव है हमारी जो भी बात है वह हम कह रहे हैं आप उसे बिल्कुल भी मानिए मत 

आप उसे जानने का प्रयास कीजिए और वह जानने के प्रयास में उसको स्वयं पर निरीक्षण कीजिए 
उस बात को किसी दूसरे पर लागू ना करके स्वयं पर, स्वयं के परिवार पर, स्वयं के बच्चों पर, स्वयं के माता-पिता पर निरीक्षण करेंगे तो आप किसी स्तर पर उसको जांच पाएंगे … 
ऐसा हमारा प्रस्ताव है हमारी बात आप मानने नहीं जानने का प्रयास करें .. ऐसा आग्रह है ।।
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हर घर में बच्चे अवतार लेते हैं अपने माता पिता को यह एहसास दिलाने को कि भैया ठहरो समझो ।।
माता-पिता के अहंकार को कौन हटा सकता है सिर्फ उनकी अपनी संतान,  बाहर वालों से तो हम लड़ सकते हैं लेकिन घर परिवार में अपने बच्चों से लड़ना संभव नहीं है इसलिए जब यह बच्चे आईना दिखाते हैं तो बात समझने की दृष्टि से अगर हम समझे तो समझ सकते हैं ।।।
तो बच्चे भगवान का एक अवतार है हमें ऐसा लगता है जो अपने माता-पिता को एहसास दिला सकते हैं 
कि आप कहां है ?

कहां जा रहे हैं ?

और हमें कहां ले जा रहे हैं 

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जरा रूके, ठहरे सोचे .

फिर आगे बढ़े
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जिंदा रहना और जीना क्या यह दोनों एक बात है या कुछ दिन है 
क्या हम यह दोनों को एक ही समझते हैं??
 या इन दोनों के अंदर जो भिन्नता है हम उसे समझ सकते हैं ?
*जिंदा रहना है*

आहार निद्रा भय और प्रजनन 
जबकि *जीना है*

भयमुक्त जीना 

अभाव का अभाव होना 

विश्वास में जीना 

 समृद्धि में जीना 
 गरीबी है साधनविहीन दुखी दरिद्र अमीरी है साधन-संपन्न (दूसरे की नजर में) स्वयं की दृष्टि में नहीं है ..

दूसरे की दृष्टि में लगता है कि यह व्यक्ति अमीर है इसके पास सभी साधन है 

तो अमीर की परिभाषा है साधन-संपन्न दुखी दरिद्र .  सुखी तो वह भी नहीं है 
और समृद्धि का अर्थ है साधन संपन्न सुखी और उदार .

 झगड़े का कोई स्थान नहीं अभाव का अभाव

 अभाव का अभाव का अर्थ है आवश्यकता से अधिक होने का भाव 
 जब आपको हो जाए तो यानि अभाव का अभाव हो गया 
 ठीक लगती है वह 

तो संबंधों में तृप्ति 

स्वयं के प्रति विश्वास 

परिवार में समृद्धि 

शिकायत मुक्त मानव 

शिकायत मुक्त संबंध 

स्वस्थ शरीर 
जब आपके पास यह सब हो तो दूसरे के परिवार को यह सब देना यह भी आप ही के जीने का हिस्सा है क्योंकि आप अपने परिवार को यदि सब कुछ देभी पाए तो जब आपकी बेटी का विवाह करने आया या बेटे का विवाह करने की बारी आएगी तो घर में नहीं होगा वह सब समाज से होगा 
तो समाज में दूसरा परिवार अगर दुख में है, जीना नहीं जानता है,  तो वह आपके भी परिवार को जीने में समस्या उत्पन्न करेगा 
तो मूल जीना हुआ स्वयं तो यह सब जानना उसके बाद दूसरों को यह जीना सिखाना समझाना ताकि 
अखंड समाज बने 

भयमुक्त बने 

यह जीना हुआ 
तो जिंदा रहना है मूल बातें आहार निद्रा भय प्रजनन जो हम करते आ रहे हैं रूप बल धन और पद की दौड़ में हम लगे हुए हैं 
असल में जीना है बुद्धि से जीना जो हमने आपको बताया विश्वास से जीना भयमुक्त जीना समृद्धि में जीना सुख में जीना स्वस्थ जीना आप अपनी बात कहें आपको यह बात कैसी लगती है
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पशु गंध (इन्द्रिय) से भय आहार निद्रा मैथुन करते हैं 

जबकि 

मनुष्य इंद्रियों की तृप्ति के लिए आहार निद्रा भय मैथुन करते हैं 
यानी मनुष्य के लिए आहार निद्रा भय मैथुन साधन है और लक्क्षय है इंद्रियों के सुख के लिए ।
जबकि पशु के लिए इंद्रियां माध्यम हैं और लक्ष्य है आहार निद्रा भय और मैथुन । 
पशु का जीवन जहां संपूर्ण होता है लेकिन मनुष्य यहां पर पूर्ण नहीं हो पाता इससे बढ़कर है मनुष्य का लक्ष्य 
अन्यथा जिन मनुष्य का लक्ष्य केवल आहार निद्रा भय और मैथुन है वह तो पशु समान है 
कृपया इस बात को जांचे 

स्वयं पर निरीक्षण करें ।
क्या आपका जीवन भी पशु के जीवन के समान है ?
या उस में कुछ ऐसा है जो पशु के जीवन में नहीं है और आपके में है । इंतजार रहेगा ।। 
 धन्यवाद ।।।
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कॉलोनी के बाहर नक्शा लगा होता है उस नक्शे में मकान का पता लिखा होता है क्या उस पते को देखकर या नक्शे को देखकर हम उस घर तक पहुंच सकते हैं यदि उंसमे यह न लिखा हो कि आप अभी यहां पर हैं ?
 इससे हमें क्लियर पता चलती है कि आप यहां है और यहां जाना है तो फिर आप रास्ते खोज लेते हैं लेकिन यदि आपको यही ही नहीं पता कि आप *कहां खड़े हो* तो *कहां जाना है* की तो बात ही नहीं है 
यानि कहां जाना है यह भी स्पष्ट होना चाहिए और कहां आप अभी खड़े हो जब यह दोनों होगा तो आप रास्ता खोज ही लेंगे किसी भी माध्यम से 
लेकिन क्या आप को इस जीवन में यह स्पष्ट है कि आप कहां खड़े हो और कहां जाना चाहते हो 
जरा इसका उत्तर स्वयं को देने का प्रयास करें कुछ निकले तोे बताएं 
धन्यवाद
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*यह धरती पर सारी अव्यवस्था अमीरों की मानसिक गरीबी की अभिव्यक्ति है* 
*जो जिसके पास है वह उसे बांटेगा ही* 

(अनिवार्य रूप से) 
जैसे दुखी व्यक्ति दुख ही बांटेगा कन्फ्यूज्ड व्यक्ति कन्फ्यूजन ही बटेगा 
जब हम यह समझ जाते हैं कि सामने वाला व्यक्ति जो बांट रहा है वही उसके पास है तो संवाद सरल हो जाता है हम समझ पाते हैं कि सामने वाले व्यक्ति कहां खड़े हैं और एक संवाद की स्थिति बनती है ..
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जो जिसको महत्वपूर्ण समझता है वह उसी के लिए तन मन और धन लगाता है
 बुद्धि माने बोध 
माने निश्चयात्मक स्वीकृति 
यानि जानना जानने का अर्थ है दूसरे की जिज्ञासा तृप्त हो जाए 
*तृप्ति हो जाए यानि जीना*
क्या हम अनिश्चित है या तृप्त है ?
क्या हम सुख के लिए निश्चित हैं ?
क्या हम सम्मान के लिए निश्चित हैं ?
यह प्रश्न स्वयं से करें और उत्तर देने का प्रयास करें ..
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*रूप बल धन और पद* यह सब स्थाई है या अस्थाई है?
 इनसे हम क्या प्राप्त करना चाहते हैं स्थाई चीजें सम्मान 
क्या आप अस्थाई से स्थाई को प्राप्त कर सकते हैं ?
क्या यह संभव है कि अस्थाई से स्थाई की प्राप्ति हो जाए ?
क्या आप जो सम्मान या सुख चाहते हैं वह स्थाई चाहते हैं अस्थाई चाहते हैं ?
 सुख या सम्मान जो भी हम चाहते हैं वह निरंतर चाहते हैं ना या थोड़ी देर सुख मिल जाए थोड़ी देर दुख मिल जाए 

, थोड़ी देर सम्मान मिल जाए थोड़ी देर बेइज्जती भी चल जाएगी ऐसा नहीं है ना यानी हम स्थाई समाधान चाहते हैं 
 लेकिन किन माध्यम से अस्थाई रूप बल धन और पद से 
क्या आप यह बता सकते हैं कि इसके सिवा ऐसी कौन सी वस्तु है ऐसी कौन सी चीज है जो स्थाई हो और उससे हम स्थाई सम्मानी स्थाई सूख अपने स्थाई चाहत को पूर्ण कर सके ?
और संक्षेप में कहें 

भूतकाल की पीड़ा 

वर्तमान से विरोध और 

भविष्य की चिंता 
इन सब से हमारा जो युद्ध है संघर्ष है क्या हम इसका स्थाई समाधान चाहते हैं ?
 और उस स्थाई के समाधान के लिए हमारे पास क्या स्थाई है ?? सोचिए ….
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सारी चर्चा का क्या निष्कर्ष निकला ?

 मैं कहां खड़ा हूं ?

मेरे परिवार के साथ रिश्ते कैसे हैं ?

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मैं क्या चाहता हूं ?

मेरे लिए कितना पर्याप्त है ?

मेरा जीना कैसा है ?

क्या मैं जिंदा हूं या मैं जी रहा हूं ?

मैं गरीब हूं अमीर हूं या मैं समृद्धि हूं ?

मैं जहां भी हूं मैं समृद्ध कैसे हो सकता हूं ?
जरा सोचें …
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क्या बनना चाहते हो यह प्रश्न ठीक है बच्चों से या क्या होना चाहते हो ?
 दोनों में अंतर है समझ सके तो 

बच्चों को प्यार देने का मतलब साधन देना नहीं है AC देना गाडी देना इन्वर्टर देना यह सब साधन है ,
बच्चों को समझ देना, सुख देना ही असली प्यार है क्योंकि जो अस्थाई आप उसे दे रहे हैं वह निरंतर उसे सुख नहीं देने वाला।। 
सहमत हैं ?? 
अपनों के लिए तो पशु भी करता है  ।
 दूसरों के जिंदा रहने में अपना तन मन और धन लगाना यह *संवेदनशीलता* है जबकि जब हम अपनों के लिए कुछ करते हैं *मात्र अपनों के लिए करते हैं* तो वह *संवेदनहीनता* है उसे हम मोह-वश भी कह सकते है .
 दया और करुणा संवेदनहीनता का भाग है या संवेदनशीलता का ?
आप प्रयास करें हमारे अनुसार इसका उत्तर सही समझ वाला व्यक्ति आराम से दे पाएगा 
चिंतन करें 
*दूसरों की योग्यता से प्रभावित ना होना ही मेरी योग्यता* है 
*स्व मूल्यांकन क्या है ?*

जो दूसरे के मूल्यांकन से प्रभावित ना हो यानी हम स्वयं को दूसरे के मूल्यांकन से ना जांचे .
हम स्वयं मूल्यांकन करें क्योंकि हम से बेहतर हमें दूसरा कोई भी नहीं जानता है 
स्वयं को वातावरण के दबाव से मुक्त करना ही स्वतंत्रता है 
वातावरण का अर्थ क्या है ?
वातावरण हमारी सोच में है हमारी समझ में है 
समस्या कहां है ? सोच में है समझ में है ..
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हमने जीवन में बहुत डिग्री हासिल करी बहुत कार्य किए समाज के लिए ,

बहुत दान दिया ,

बहुत सेवा करी ,

जिससे हमें लगता है कि हम अच्छे हैं और हम अच्छे काम कर रहे हैं लेकिन जितना भी हमने किया उसमें हम यह पाते हैं कि क्या हम यही कार्य जो हमने स्वयं कर लिया समाज के लिए कर लिया क्या हमने वह अपने संबंधों में अपने परिवार में कर पाए? 

 यह प्रश्न है 

*संबंध में तृप्ति पूर्वक जीने की योग्यता क्या हमने हासिल करी ?* 
एक से एक बड़ा विद्वान *(यहां पर परिभाषित कर दूं विद्वान आज की शिक्षा व्यवस्था के अनुसार डिग्री होल्डर को हम विद्वान समझते हैं डॉक्टर वकील चार्टर्ड अकाउंटेंट पढ़ा-लिखा इंजीनियर इन सब की डिग्री लेना शिक्षक पीएचडी करना इन सबको सोचा हमने कि अगर हम यह कर लेंगे तो हम समझदार हो जाएंगे )* क्या यह सही लगता है यह सभी स्किल है हुनर है या समझ है या विशेषता है 
अगर हम इन में अंतर कर पाएं तो हम समझ पाएंगे की समझ अगर यह होती तो समझदार व्यक्ति संबंधों में तृप्ति पूर्वक जीने की योग्यता को प्राप्त कर पाता ,
लेकिन हम पाते हैं कि जब से यह शिक्षा व्यवस्था हुई है या प्राचीन भी रही , झगड़े संबंधों में रहें,  रामायण काल में भी संबंधों में झगड़ा था चाहे भरत और राम में ना हो लेकिन केकई और राम में तो था, किसी भी वजह से था , महाभारत में तो संबंधों की ही परिवार का झगड़ा था पूरा का पूरा,  तो यह मात्र अंग्रेजों की या मैं मैकाले शिक्षा की देन है ऐसा भी कहना उचित नहीं क्योंकि यह पीछे से लगातार चला रहा है 
तो हमने हुनर सीखें ,skill सीखी , शस्त्र सीखा, शास्त्र सीखा , मानव के साथ संबंधों में रहने की शिक्षा हमारी हुई क्या यहां पर हम सभी विफल है 
चाहे वह शिक्षित हैं चाहे वह अशिक्षित है 
दो धाराएं बड़ी प्रचलित चली 

एक धारा ईश्वरधारा

 ईश्वर को प्राप्त करने के लिए भक्ति का मार्ग , भक्ति के लिए विरक्त,  विरक्त से मतलब त्याग , सब कुछ छोड़ दो त्याग करो समाज छोड़ दो जंगल चले जाओ उदाहरण है यह, उससे नीचे निकल कर आया कि हम न्यूनतम में जीने की धारा को ईश्वर का मार्ग कह रहे हैं कि हम कम से कम साधन में जिए।
 दूसरी धारा चली

शरीर के लिए सुविधा ,

सुविधा प्राप्त करने के लिए संग्रह ,

संग्रह करने से भोग और 

भोग के लिए अधिकतम यानी अधिकतम से अधिकतम को लेंगे तो शरीर को सुख मिलेगा यह दूसरी धारा है
 पहली धारा में न्यूनतम धारा है जो ईश्वरीय धारा है जिसे हम ईस्ट की धारा कह सकते हैं और वेस्ट यानी पश्चिम की धारा को हम कह सकते हैं अधिकतम वाली धारा तो जब हम दोनों में आएंगे तो दोनों ही अपर्याप्त है एक न्यूनतम में कहता है एक अधिक्तम में कहता है क्या दोनों प्रैक्टिकल है ? 

क्या दोनों में से कोई एक है जो सॉल्यूशन दे पाया अगर पहली धारा ईश्वरीय धाराएं सॉल्यूशन को दे पाती तो आज सभी को मोक्ष प्राप्त हो चुका होता जितने भी लोग भागवत कथा प्रवचन देवी देवता के इन सब में जाते हैं वह सब भी तो दुखी ही चल रहे हैं जीवन में उन्हें भी मानव को मानव समझने की विधि या तरीका या मॉडल सिस्टम समझ नहीं आया 
जो इस मॉडल को समझा रहे हैं क्या उन्हें समझ आया अगर वह भी उसको नहीं जी पा रहे हैं उनके भी घर में लड़ाई झगड़े है प्रॉपर्टी का विवाद है तो समझाने वाले को ही नहीं आता समझने वाले को फिर वह क्या दे पाएगा .
जो जिसके पास होगा दूसरे को वही दे पाएगा इसी वजह से हमारे ऊपर आक्रमण हुए और दूसरी धारा लागू हुई अब दूसरी धारा से आज हम प्रेजेंट में पीड़ित है  , हम स्वयं झेल पा रहे हैं उसे स्वयं झेल रहे हैं, तो फिर हम को दोनों धारा से सुख नही मिला । 
अब क्या करे ? क्या ऐसा सम्भव है कि एक ऐसी धारा बने जिसमें सबको सुख मिले और स्वयम के साथ सब को मिले  स्वयं के साथ साथ परिवार को सुख मिले परिवार सुखी हो जाए तो समाज को सुख मिले क्योंकि परिवार की इकाई एक मानव है ,

कई मानव मिलकर परिवार बनाते हैं, कई परिवार मिलकर समाज बनाते हैं, और समाज से ही पूरी सृष्टि का निर्माण है ।
आप अपने लिए करते हैं यह सभी को करना आता है, हम जी रहे हैं लेकिन हम परिवार के लिए कितना करते हैं,  परिवार वालों को सुखी कर पाते हैं क्या ??

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 हम कितना भी कर ले परिवार में फिर भी द्वेष रहता है 
तो हमें संबंधों में जीना नहीं आता हमने सब ले लिया डिग्री डिग्री लेकिन संबंधों में जीने की डिग्री हमारे पास नहीं है, 
 ना ही कोई ऐसा कोर्स ना ही कोई ऐसी व्यवस्था हमें आती है तो यह सीखने की बहुत आवश्यकता हमें लगती है .
आप बताएं आपको क्या लगता है…
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*परिवार में जीने का मॉडल मानव जाति के पास प्रस्तुत रूप तो छोड़िए कल्पना में भी नहीं है*
हमने जिंदा रहने को जीना बराबर समझ लिया 

हमने स्किल को समझ समझ लिया, हमने स्किल को शिक्षा समझ लिया, हमने सूचना को शिक्षा समझ लिया, हमने आईक्यू को तर्क को बुद्धि समझ लिया,
आज की हमारी समाज की व्यवस्था को देखें तो शिक्षक या शिक्षा व्यवस्था में जो शिक्षक है उस को समझें ,
*शिक्षक कौन बनता है हम सभी के परिवारों में ईमानदारी से उत्तर दें ,स्वयं को उत्तर दें कि शिक्षक कौन बनता है ?* 
जो MBA डॉक्टर इंजीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट वकील या और भी बड़े काम नहीं कर पाता है वह इन सब से हटकर (मुझे क्षमा कीजिएगा मेरा यह अभिप्राय बिल्कुल नहीं है कि मैं किसी को नीचा दिखाऊं लेकिन यह वास्तविकता है समाज की , कि इन सभी को ऊंचा रखा गया और शिक्षक को नीचे रखा गया )और शिक्षक वह बनता है जो इन सभी स्थानों पर नहीं जा पाता तो शिक्षा की तरफ मुड़ जाता है , रोजगार के लिए , नौकरी के लिए कि कुछ नहीं तो कम से कम यह करना है ,वह नहीं कर पाया तो चलो शिक्षा की तरफ B.Ed कर लेता हूं । 
*क्या यह दयनीय गरीबी की स्थिति हमारी शिक्षा व्यवस्था की हमारे समाज की है या नहीं है?*
होना क्या चाहिए ? होना क्या चाहिए?
 शिक्षक सबसे ऊपर होना चाहिए कि नहीं ?
शिक्षक कौन है जो समाज को शिक्षा देता है जो समाज को बनाता है जो व्यक्ति का निर्माण करता है 
व्यक्ति के निर्माण को हमने कम समझा पर स्किल की डेवलपमेंट को हमने बड़ा समझा, skill डेवलपमेंट व्यक्ति को ही देंगे ना और व्यक्ति का निर्माण किया नहीं , 
जब टॉप क्वालिटी के लोग शिक्षक नहीं बनेंगे तो वह क्या शिक्षा देंगे यह बताने की आवश्यकता नहीं है 
*तैयार करना बड़ा काम है या तैयार माल का उपयोग करना बड़ा काम है*
 अगर तैयार करना बड़ा काम है तो शिक्षक बढ़ा हुआ यह काम शिक्षक करता है और हमने शिक्षक को कहां बिठाया हुआ है हमारी व्यवस्था ने कहां बिठाया हुआ है यह हमें सोचने की जरूरत है 
जब एक शिक्षक समझदार होगा जब परिवार समझदार होगा इन दोनों के बीच में ही एक बच्चे का जीवन झूलता है, निर्माण होता है ..
बच्चे को शिक्षक अच्छा मिल जाए , बच्चे को पालक परिवार अच्छा मिल जाए ,दोनों को जीना आता है , दोनों की कथनी करनी में अंतर ना हो , तो यह बच्चा क्या कुछ और सीख जाएगा क्या ?? 
 वही सीखेगा ना जो इन्हे सिखाया जाएगा , जो यह देखेंगे आचरण में , जो आपके जीने में यह देखते हैं वही तो ग्रहण करते हैं , या जो आप सिखाते हैं वह ग्रहण करते हैं और तीसरा तो माध्यम नहीं है । तो आज की युवा को या आज के शिष्य को हम दोषी कहकर कटघरे में खड़ा करते हैं असली दोषी कौन है शिक्षक पालक और उन से बड़ा दोषी कौन है ?  मैं स्वयं क्योंकि मैं ही शिक्षक हूँ शिक्षक मेरे समाज से ही आता है  ।। समाज की सबसे छोटी इकाई मैं स्वयम हूँ ।।
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जीना क्या होता है ?

विश्वास के साथ जीना ?

विश्वास हमें कैसे मिलता है ?

जीने में विश्वास हमें लगता है कि हम कोई स्किल कोई हुनर कोई डिग्री हासिल कर ले तो हमारे धन का साधन का प्रबंध हो जाएगा जिससे हमें यह जीने में विश्वास हो जाता है .
मानवजाति के पास दो ही जिज्ञासा है पहली *क्यों जीना purpose क्या पाना चाहते हो क्या लक्ष्य है ?*
दूसरा *कैसे जीना, तरीका क्या हो, क्या दिशा हो*
क्या आपके जीवन में यह प्रश्न उठे स्वयं से क्या आपको पता है क्यों जीना कैसे जीना दोनों में से मूल प्रश्न कौन सा ?
हम क्या कर रहे हैं अभी ?

क्या हमें पता है हम क्यों जी रहे हैं या हम जी रहे हैं मात्र ?
1 एक्सरसाइज कीजिए अपनी आंख बंद कीजिए और सोचिए कि आप अभी क्यों जी रहे ?

क्यों जीवित हैं ?

आप इसका उत्तर स्वयं को देने का प्रयास कीजिए
 पेन पेपर उठाइए और लिखिए क्यों जी रहे हैं आप ??
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विद्यार्थी कौन है ?

जिसके पास प्रश्न है 
शिक्षक कौन है ?

जिसके पास उत्तर है 
विद्यालय क्या है ?

जहां यह उत्तर दिया जाता है 
*क्या हमारे आज के प्रश्न का उत्तर शिक्षक या विद्यालय के पास है परिवार के पास है समाज के पास है* 
जब एक बच्चा परिवार की ममता को छोड़ कर पहली बार स्कूल जाता है तो उसे वहां परिवार की ममता नहीं मिलने से क्या वह वहां रुकना चाहता है ?
तो जब जब विद्यालय परिवार बन जाए तो बच्चे को स्कूल भेजना नहीं पड़ेगा बच्चा स्वयं स्कूल जाने की बात करेगा
 विद्यालय को परिवार बनना होगा और परिवार को विद्यालय भी बनना होगा 
 शिक्षा केवल और केवल शिक्षक से नहीं ली जाती यह पालक के आचरण से भी आती है और पालक के द्वारा भी आती है 
सभी को यह उत्तर मिल जाए यह जिम्मेदारी समाज और सरकार की है इससे ज्यादा समाज और सरकार कुछ कर नहीं सकते यह सोचने की बात है
 एक्सरसाइज करें अपने घर में 6 by 4 का वाइट बोर्ड लगाएं और अपने बच्चों को बोले कि अपने प्रश्न जो भी प्रश्न है जो भी प्रश्न है वह इस बोर्ड पर लिख दे दिन रात सुबह शाम जब मन करे तब लिख दे अकेले में लिख दे 
और फिर उसका आनंद देखिए आपको अनुभव होगा कि ऐसे प्रश्न जो आप सोच भी नहीं सकते वह बच्चा सोच रहा है 
और जब उसके प्रश्न आपको मिलेंगे तो आप उत्तर देने की स्थिति में आ पाएंगे, अभी तो हम तक प्रश्न ही नहीं पहुंच रहे हैं 
वह कुछ और चाहता है हम कुछ और चाहते हैं और इसी के झगड़े चल रहे हैं कर के देखिए।।
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द्वितीय दिवस पूर्ण ।।।

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