गाँवों के खेल

गाँवों के खेल

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Math Dances

जलेबी रेस , कंचा रेस , सतोलिया , लट्टू , गिल्ली डंडा ,लंगड़ी टांग


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भारत की आत्मा गांवों में बसती है | गाँव की औरतें दिन भर चूल्हा चौका , बर्तन झाडू में लगी रहती हैं | यहाँ तक कि गाय , भैंसों का काम एवं खेती बाड़ी में भी दिन भर खटती रहती हैं | इन महिलाओं के लिए या इनके बच्चों के लिए टेबल टेनिस , बेडमिन्टन एवं गोल्फ जैसे खेलों को एक सपना ही कहा जाएगा | जहाँ दो वक़्त की रोटी मुश्किल से नसीब होती हो , जिसके लिए इतनी मेहनत करनी पढ़ती हो , वहां यदि कुछ पल फुर्सत के निकाल कर खेल कूद की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएँ तो गाँव की महिलाओं एवं बच्चों का उत्साह देखते ही बनता है | सीमित साधनों में मनोरंजन हो जाता है और  इनके चेहरे की ख़ुशी देखते ही बनती है |
गाँव में फुर्सत में बच्चे यह खेल अक्सर खेला करते हैं | लड़कों का मनपसंद खेल है गिल्ली डंडा और कंचे  , लड़कियों का लंगड़ी  टांग और सतोलिया | जिन लोगों को इन खेलों के बारे में पता नहीं है या वह शहरी लोग जिनकी सुबह होती है ई मेल देखने से और सारी रात बीतती है सोशल नेट वर्किंग , फेस बुक , ट्विटर , ऑरकुट इत्यादि पर उनके लिए तो यह एक अजूबा ही हैं |
आइये देखें क्या होते हैं यह खेल :

जलेबी रेस :

१५ अगस्त या २६ जनवरी  को यह खेल आयोजित किया जा सकता है | इसमें एक रस्सी टांगी जाती है जिस पर जलेबियाँ लटकाई जाती हैं | महिलाएं एवं बच्चे सब इसे खेल सकते हैं | एक , दो , तीन की गिनती के साथ रेस शुरू होती है | भागते भागते ऊपर उचक कर जलेबी को खाना पड़ता है और फिर से सरपट दौड़ना पड़ता है | स्वाद का स्वाद और खेल का खेल | कार्बोहाईड्रेट खाओ और फिर उसे पचाओ | इससे अच्छा भला और कौन सा खेल होगा ? सबकी निगाहें ईनाम के पैकेट की तरफ लगी रहती हैं , उत्साह दुगुना हो जाता है |

चम्मच रेस :

इसमें एक चम्मच मुंह में पकड़ना पड़ता है जिसमें एक कंचा रखा रहता है | एक , दो, तीन और यह शुरू हो गयी रेस | अरे ये क्या , कंचा ही गिर गया | इतना आसान भी नहीं है साड़ी पहनकर दौड़ना | समाज के किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति द्वारा ईनाम वितरित किये जाते हैं | हाल ही में मैंने अखबार में पढ़ा था कि किसी गाँव में इसका आयोजन किसी गैर सरकारी संस्थान द्वारा किया गया था | पढ़कर अत्यंत ही ख़ुशी हुई | साड़ी पहने हुए औरतों की फोटो भी अखबार में थी | गाँव में मल्टीप्लेक्स या मॉल तो होते नहीं हैं इसलिए भोले भाले लोग छोटी छोटी खुशियों से ही खुश हो लेते हैं |

सतोलिया :

सात पत्थरों का खेल | इसमें कोई पैसा खर्च नहीं होता और स्वास्थ्य भी बना रहता है | ढूँढने पड़ते हैं सिर्फ सात चपटे पत्थर जिन्हें एक के ऊपर एक जमाया जाता है | नीचे सबसे बड़ा पत्थर और फिर ऊपर की तरफ छोटे होते पत्थर |
दो टीमें होती हैं और एक गेंद | इसे घर के बाहर या पार्क में भी खेला जा सकता है | गाँव में तो जगह की कोई कमी नहीं है , आप चाहें तो अपने फ्लैट के आगे शहर में भी खेल सकते हैं | एक टीम का खिलाडी गेंद से पत्थरों को गिराता है और फिर उसकी टीम के सदस्यों को उसे फिर से जमाना पड़ता है और बोलना पड़ता है ” सतोलिया ” | इस बीच दूसरी टीम के ख़िलाड़ी बॉल को पीछे से मारते हैं , यदि वह बॉल सतोलिया बोलने से पहले लग गयी तो टीम आउट | कितने भी लोग इसे खेल सकते हैं पर दोनों टीमों में होने बराबर के चाहियें | यदि एक एक्स्ट्रा ख़िलाड़ी है तो उसे किसी को पटाना पड़ता है खेलने के लिए , चाहे उसका मन हो या न हो |
है न अच्छा खेल ? न जगह का गम  और  न पैसे का , सिर्फ एक गेंद की ही तो बात है |
देर किस बात की है , हो जाइए शुरू |

लंगड़ी टांग :

यह अक्सर लड़कियों द्वारा छत पर या आँगन में खेला जाता है | कई खाने बनाये जाते हैं , यह चाक या खड़िया या फिर ईंट के टुकड़े
से बनाये जाते हैं  और दो लडकियां इसे एक चपटे पत्थर के टुकड़े से खेलती हैं | पत्थर को एक टांग पर खड़े रहकर सरकाना पड़ता है , बिना लाइन को छुए हुए  | अंत में एक टांग पर खड़े रहकर इसे एक हाथ से बिना लाइन को छुए उठाना पड़ता है | भरी दोपहरी में जब नींद न आ रही हो और पढने का भी मन नहीं हो तो क्या करें ? जी हाँ तब खेलिए लंगड़ी टांग और देखिये कि आपने इसे न खेलकर ज़िन्दगी के बेहतरीन पल कैसे गँवा दिए |

लट्टू :

इसे अक्सर लड़के लोग हाथों पर रस्सी द्वारा नचाते हैं और फिर फर्श पर फेंकते हैं | जब दिमाग में तनाव हो या पढने में मन नहीं लग रहा हो तब कुछ देर लट्टू चलायें , तब देखिये कि कितना फोकस होकर पढ़ पाते हैं और साथ ही साथ होता है हाथों और पैरों का व्यायाम |

कंचे :

यह अक्सर लड़कों द्वारा खेला जाता है | एक गड्ढा बनाया जाता है और उसमें कुछ दूरी से जहां एक रेखा खिंची होती है कंचे फेंके जाते हैं | जिसके कंचे सबसे ज्यादा गिनती में गड्ढे में जाते हैं वह जीतता है | कुछ यूँ समझ लीजिये कि यह शहर में खेले जाने वाले बिलीअर्ड की तरह ही है |

रस्सी कूदना :

वैसे तो सभी को पता है कि रस्सी वजन घटाने  के लिए एक अच्छा व्यायाम है पर गाँव में इसे दूसरे तरीके से खेल की तरह खेला जाता है | वहां वजन का टेंशन जो नहीं होता इसलिए मज़े लेकर खेला जाता है | दो लडकियां एक रस्सी को दोनों सिरों से पकड़ लेती हैं और उसे घुमाना शुरू  करती हैं | तीसरी लड़की बीच में कूदती है | सबकी बारी आती है , जो सबसे ज्यादा बिना रुके कूदती  है वह जीतती है |

गिल्ली डंडा :

गिल्ली एक स्पिंडल के आकार की होती है और साथ में होता है एक छोटा सा डंडा | गिल्ली के एक सिरे को डंडे से मारा और ये गयी गिल्ली हवा में | आरे भाई जरा अपनी आँख बचाना यह बहुत खतरनाक होती है |

बोरा रेस :

एक बोरे में टांगें बाँध दी जाती हैं और कूद कूद कर भागना पड़ता है | सब गिरते पड़ते हुए भागते हैं , देखकर बड़ी हंसी आती है |

तीन टांग की रेस :

दो जनों की एक एक टांग साथ में बाँध दी जाती है और फिर रेस लगायी जाती है | आपसी तालमेल होना बहुत जरुरी होता है |

मटका रेस :

गाँव की औरतें और लड़कियां हों और मटका रेस न हो बड़ा अजीब सा लगता है न ?

गुटके :

इसे लड़कियां गोल गोल छोटे छोटे पत्थरों से खेलती हैं | दायें हाथ से गुटका उछाला जाता है और बायें हाथ को घर या कुत्ते के आकर में रखकर उनके नीचे से गुटके निकले जाते हैं | फिर सबको एक साथ एक हाथ से एक गुटका ऊपर उछालते हुए उठाना होता है |
शब्दों में बयां करना अत्यंत ही कठिन काम है | इसे खेलिए , अपने आप समझ में आ जाएगा | हाथों का इससे अच्छा व्यायाम और नहीं हो सकता |
और भी न जाने कितने खेल हमारे देश की उपज हैं जिन्हें हम भूलते जा रहे हैं | अरे हाँ कबड्डी तो मैं भूल ही गयी और क्रिकेट भी तो तीन डंडे गाढ़कर खेला जाता है | तैराकी को ही लीजिये , जरा सी बरसात हुई नहीं कि बच्चे लग गए पोखर और तालाबों में तैरने ,इनके लिए तो यही स्विमिंग पूल है , किसे चिंता है बीमार होने की | अपनी मिट्टी में पलकर बढे हुए हैं तो उससे भला डर कैसा ?
मेरा आप सबसे निवेदन है कि इन खेलों को बढ़ावा दें , गाँव में ही क्यूँ शहरों में भी इन्हें खेलें | अपने खेलों को खेलने में भला कैसी शर्म | अपने देश के गाँव में जाने से कैसी शर्म | खेतों की पगडंडियाँ , मिट्टी की सौंधी खुशबू , कुएं का पानी , चूल्हे की रोटी , साग , गुड़ , छाछ सब बुला रहे हैं आपको | चलिए चलें इन सबका आनंद लें और साथ ही साथ करें मनोरंजन और देखें ख़ुशी बच्चों के चेहरों पर |
खेजड़ी का पेड़ और
लाल चूनर
बस आता ही होगा
मेरा गाँव
 घूंघट की ओट में छुपा हुआ
बहुत शर्माता है
प्यारा प्यारा गाँव
महकती ढाणियां
खेलती पगडंडियाँ
कुएं के पानी सा
मीठा गाँव
गया था इक बार
शहर की ओर
पथरीला सा होता
  हरा भरा गाँव
जाने कौन ले जाए
फिर से इक टुकड़ा
डरे डरे हैं रास्ते
सहमा सहमा गाँव
कजरारी अखियों में
चूल्हे का धुआं
फ़ैल गया काजल
सिमट गया गाँव
आओ मिल के बांटें
खुशियाँ पल दो पल
जाने कब ग़ुम हो जाए
हमारा प्यारा गाँव
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