आरक्षण द्वारा हिंदूओ का बंटवारा

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    Hindu Divide and Rule
    हिन्दू-विभाजन

     

    आरक्षण के किसी भी नेता ने किसी भी मंडल ने जो भी चाहे फायदे बताएं हो उनमे से एक भी फायदा अगर देश को हुआ हो तो बताएं..

    एक नुक्सान जरुर हुआ है जो साबित करता है की कितनी सोची समझी साजिश के तहत यह सब किया गया .

     

    भारत में आरक्षण सिर्फ और सिर्फ एक कारण से किया गया और वह पूरी तरह से सफल भी हुआ इसलिए इस hidden एजेंडा के बारे में कोई भी देशद्रोही या बिकाऊ मीडिया या अंग्रेजी चाटुकार बात भी नहीं करते..

    Hindu Divide and Rule
    Hindu Divide and Rule

     Hindu Divide and Rule

    ऊपर दिए चित्र में स्पष्ट है क्यूँ आरक्षण लाया गया.. हिन्दू के टुकड़े टुकड़े करके उन्हें आपस में लड़ाई में व्यस्त रखो. अंग्रेजो ने यही काम भारतीय सेना में किया..

    मात्र् दिखावे के लिए राजनितिक दल इसके पक्ष और विपक्ष दोनों तरफ बात तो करते हैं पर इस मूल उदेश्य और hidden एजेंडा पर चुप्पी नहीं तोड़ते.

     

    आरक्षण पर मंडल कमिशन

    Mandal Commission
    Mandal Commission

    यह एक सर्वविदित तथ्य है कि दलितों के मसीहा और संविधान के निर्माता माने जाने वाले भीमराव अंबेडकर ने संविधान सभा में यह प्रस्ताव रखा था कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को शिक्षा संस्थाओं और नौकरियों में केवल तीस या चालीस साल तक ही आरक्षण दिया जाए और इसके साथ यह प्रावधान भी हो कि इस अवधि को किसी भी सूरत में बढ़ाया नहीं जाएगा. अंबेडकर इस बात के सख्त खिलाफ थे कि समाज का कोई भी अल्पसंख्यक तबका सदा के लिए अल्पसंख्यक ही बना रहे. उनका विजन था कि अपना विकास करने के बाद उस तबके को शेष समाज में घुलमिल जाना चाहिए और अपना विशेष दर्जा छोड़ देना चाहिए. अंबेडकर का प्रसिद्ध कथन है: “यह अनुचित है कि बहुसंख्यक अल्पसंख्यक समूह के अस्तित्व से इंकार करें, लेकिन यह भी उतना ही अनुचित है यदि अल्पसंख्यक हमेशा अल्पसंख्यक ही बने रहना चाहें.” लेकिन संविधान सभा ने उनकी बात न मानकर आरक्षण के लिए केवल दस वर्ष की अवधि निर्धारित की. पर इसके साथ ही यह प्रावधान भी जोड़ दिया कि जरूरत समझी जाये तो इस अवधि को बढ़ाया जा सकता है. नतीजा यह है कि आज संविधान लागू होने के 64 वर्ष बाद आरक्षण लागू है.

    यही नहीं, 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 1979 में गठित मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करके अन्य पिछड़ी जातियों के लिए भी आरक्षण की व्यवस्था कर दी. अब स्थिति यह है कि शिक्षा संस्थाओं और सरकारी नौकरियों में 49.5 प्रतिशत आरक्षण है. यही नहीं, सरकारी सेवा में प्रोन्नति में भी आरक्षण की व्यवस्था कर दी गई है. भीमराव अंबेडकर और राममनोहर लोहिया जैसे राजनीतिक नेता और चिंतक जाति पर आधारित आरक्षण को जातिव्यवस्था समाप्त करने के लिए इस्तेमाल करना चाहते थे, उसे मजबूत करने के लिए नहीं. अंबेडकर की तो एक पुस्तक का शीर्षक ही “जाति का संहार” है. लेकिन स्वतंत्रता के बाद का इतिहास बताता है कि पिछले सात दशकों में जाति व्यवस्था टूटने के बजाय और अधिक मजबूत ही हुई है और आरक्षण सामाजिक न्याय का पर्याय बन गया है.
    देश में जाति-आधारित पार्टियों की संख्या और शक्ति में भी वृद्धि हुई है. भले ही दावा कुछ भी करें, लेकिन समाजवादी पार्टी यादवों और बहुजन समाज पार्टी दलितों की पार्टियां बनकर रह गई हैं. कुर्मी, मल्लाह और इसी तरह की अन्य जातियों की भी अपनी-अपनी छोटी-छोटी पार्टियां हैं. राजस्थान में गूजर कई बार लंबे समय तक पिछड़ी जाति का दर्जा पाने के लिए उग्र और हिंसक आंदोलन चला चुके हैं. अब हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के जाट भी यही मांग उठा रहे हैं ताकि उन्हें आरक्षण का लाभ मिल सके. राजनीतिक दल भी इन आंदोलनों की आंच पर अपनी रोटियां सेंकने से नहीं चूकते. वे कभी भी जनता को यह नहीं समझाते कि आरक्षण सामाजिक विकास का एकमात्र जरिया नहीं हो सकता.
    कांग्रेस के पीछे पिछड़ी जातियों का समर्थन नहीं है. सवर्ण भी उसे छोड़ कर अन्य पार्टियों का रुख कर चुके हैं. ऐसे में यदि उसके कार्यकर्ताओं और जनार्दन द्विवेदी जैसे नेताओं को यह लग रहा है कि आरक्षण के मुद्दे पर पुनर्विचार होना चाहिए तो यह आश्चर्य की बात नहीं. आश्चर्य की बात सिर्फ यह है कि उनके जैसे कद्दावर नेता ने अपनी निजी राय को सार्वजनिक कर दिया और बदले में पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी से झिड़की खाई.
    मनुस्मृति में स्पष्ट रूप से जाति का आधार जन्म को नहीं बल्कि कर्म को माना गया है। प्राचीन हिन्दू ग्रंथों में अनेक ऐसे उदाहरण हैं जबकि दलित जातियों में उत्पन्न व्यक्तियों को उनके कर्मों की वजह से ब्राह्मणों का दर्जा दिया गया। मल्लाह जाति में उत्पन्न महर्षि वेद व्यास का उल्लेख इस संदर्भ में किया जा सकता है। यह निर्विवाद सच है कि जाति व्यवस्था के खिलाफ अभियान चलाने वालों में ब्राह्मण सबसे आगे रहे हैं। इस संदर्भ में महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, शंकरदेव, सावरकर, राजा राममोहन राय आदि महान विभूतियों का उल्लेख किया जा सकता है।
    यदि आरक्षण का इतिहास देखा जाए तो वर्तमान काल में इसकी शुरूआत ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1765 में पुरानी मद्रास प्रेसीडैंसी से की थी। मद्रास के तत्कालीन राज्यपाल जान पैरी ने एक आदेश जारी किया था जिसमें कहा गया था कि कंपनी बहादुर की सेवा में भर्ती किए जाने वाले कर्मचारियों में एक तिहाई गैर-ब्राह्मण होने चाहिए। इसके बाद भारतीय समाज को विभाजित करने के लिए अंग्रेजों ने सेना में भर्ती के लिए मार्शल और गैर-मार्शल रेस की अवधारणा शुरू की।
    भारतीय समाज को खंडित करने के लिए अंग्रेजों के इशारे पर 1905 में मुस्लिम लीग बनी जिसने मुसलमानों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने की मांग की थी। इस मांग का समर्थन सर सैयद अहमद ने भी डटकर किया। आजादी के बाद समाज को विभाजित करने की इस नीति का डट कर कांग्रेस ने इस्तेमाल किया। संविधान सभा ने एक ओर तो यह फतवा जारी किया कि भारत के सभी नागरिक समान हैं और नौकरियों पर उनका समान अधिकार है मगर दूसरी ओर दलितों और आदिवासियों के लिए शिक्षा संस्थानों, विधानसभाओं और संसद के साथ-साथ सरकारी नौकरियों में भी आरक्षण की व्यवस्था शुरू कर दी।
    यह व्यवस्था शुरू में हालांकि सिर्फ 10 वर्षों की अवधि तक के लिए ही थी मगर गत 60 वर्षों से यह जारी है और वोटों की लोभी किसी भी पार्टी के लिए यह संभव नहीं है कि वे इसे अनादि काल तक जारी रखने का विरोध कर सकें। जनता दल के शासनकाल में मंडल आयोग का गठन किया गया जिसने पिछड़ी जातियों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की सिफारिश कर दी। सत्ता की लोभी किसी भी राजनीतिक पार्टी में पिछड़ों को आरक्षण से वंचित करने की अब किसी में हिम्मत नहीं है। यह सिलसिला खत्म नहीं हो रहा बल्कि दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है। यूपीए सरकार ने मुसलमानों के वोट बटोरने के लिए रंगनाथ मिश्र आयोग का गठन किया जिसने यह सिफारिश की कि अल्पसंख्यकों को सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में कम-से-कम 15 प्रतिशत आरक्षण दिया जाए और इसमें से कम-से-कम दस प्रतिशत मुसलमानों के लिए होना चाहिए।
    अब भला समाजवादी पार्टी पीछे कैसे रहती? मुलायम सिंह ने मुसलमानों को उनकी संख्या के अनुपात से 20 प्रतिशत आरक्षण देने का सब्जबाग दिखाया और उनके वोट बटोर लिए। हाल में ही केन्द्र सरकार ने जैनियों को भी अल्पसंख्यक का दर्जा देकर हिन्दू समाज को खंडित करने का एक नया घिनौना प्रयास किया है। कहा जाता है कि जैन समाज को अल्पसंख्यक का दर्जा दिलवाने में राहुल गांधी का खास हाथ है। अब जाट भी आरक्षण पाने के लिए बवाल मचा रहे हैं। गुर्जर समाज राजस्थान में यह दर्जा पहले ही प्राप्त कर चुका है। हरियाणा में जाटों, त्यागियों, ओड आदि पांच जातियों को पिछड़ा घोषित करके आरक्षण का लाभ पहले ही कांग्रेस दे चुकी है। क्या यह प्रवृत्ति समाज की एकता और समरसता के लिए घातक नहीं है?
    सत्तारूढ़ दल गरीबों के उत्थान और सामाजिक न्याय के लिए नहीं बल्कि वोट बटोरने के लिए दोनों हाथों से आरक्षण की रेवड़िया बांटने में जुटे हुए हैं। बिहार में नीतीश कुमार ने दलितों को भी राजनीतिक कारणों से दलित और महादलित में विभाजित करने में देर नहीं की है। राजनीतिक दलों द्वारा आरक्षण के नाम पर जो रेवड़िया बांटी जा रही हैं उस पर उच्चतम न्यायालय ने कुछ रोक लगाने का प्रयास जरूर किया है। उच्चतम न्यायालय ने आरक्षण की अधिकतम सीमा हालांकि 50 प्रतिशत निर्धारित कर दी है मगर अनेक राज्य इसका उल्लंघन कर रहे हैं। तमिलनाडु में आरक्षण 70 प्रतिशत तक पहुंच चुका है और यह मामला अब न्यायालय में विचाराधीन है।
    संविधान में धर्म के आधार पर आरक्षण देने की मनाही है मगर इसके बावजूद तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक आदि कुछ राज्यों में मुसलमानों को आरक्षण दिया जा रहा है। आंध्र प्रदेश में भी कांग्रेस ने मुसलमानों को पांच प्रतिशत आरक्षण देने का प्रयास किया था मगर मामला न्यायालय में चला गया। उत्तर प्रदेश विधानसभा के पिछले चुनावों में कांग्रेस के मुस्लिम चेहरे सलमान खुर्शीद ने मुसलमानों को 9 प्रतिशत आरक्षण देने के सब्जबाग दिखाए थे। यह बात दीगर है कि इसके बावजूद भी उत्तर प्रदेश के मुसलमानों ने कांग्रेस को मुंह नहीं लगाया।
    सबसे विचित्र बात यह है कि सेकुलरिज्म का मुखौटा ओढने वाली पार्टियां भी धार्मिक आधार पर आरक्षण देने का समर्थन कर रही हैं। मुसलमानों को आरक्षण देने की वकालत करने वालों में मार्क्सवादी और साम्यवादी दोनों पार्टियां शामिल हो गई हैं। दूसरी ओर राजस्थान में ब्राह्मण, बनिया और राजपूत आरक्षण प्राप्त करने के लिए वर्षों आंदोलन चलाते रहे मगर उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई। राजनीतिक दल सिर्फ उन्हीं जातियों को आरक्षण का लाभ देते हैं जो कि अधिक संख्या में होती हैं ताकि वह उनके वोट बटोर कर सत्ता की मलाई चाट सकें।
    जरूरत इस बात की है कि सामाजिक न्याय और समाज की समरसता में विश्वास रखने वाले लोग एकजुट होकर जाति के आधार पर आरक्षण देने का विरोध करें ताकि इस देश के गरीबों को चाहे उनका संबंध किसी भी जाति या धर्म से हो, आरक्षण के रूप में न्याय मिल सके और उनका सही मायनों में उत्थान हो सके।
    वैसे यह विडंबना ही कही जाएगी कि आरक्षण के कट्टर समर्थक हमारे नेता अपनी ही जाति में विवाह करने से कतराते आए हैं। बाबा साहब अंबेडकर की पत्नी ब्राम्हण थी। राम विलास पासवान व रिपब्लिकन पार्टी के नेता रामदास अठावले की पत्नी भी गैर-दलित है। बाबू जगजीवन राम के दोनों बच्चों ने दलितों से विवाह नहीं किया। इस बारे में जब एक बार किसी पत्रकार ने अठावले से पूछा कि आप दलितों में शादी क्यों नहीं करते हैं तो उनका कहना था कि हम क्या करें सवर्ण महिलाएं हमें ज्यादा पसंद करती है।
    मंडल कमीशन की सिफारिशें जब वीपी सिंह ने लागू कीं तब मंडल कमीशन ने सरकारी नौकरियों में पिछड़ों को अलग से 27 फीसदी आरक्षण देने की सिफारिश की थी। जातिवादी राजनीति का जो नंगा नाच जेएनयू जैसे सैक्युलर, समतामूलक, वामपंथी रुझान के कैम्पस में देखा था वो झकझोर देने वाला था। मंडल और आरक्षण के खिलाफ तर्क साफ हैं —
    एक, आरक्षण से देश में जातिवाद बढ़ेगा।
    दो, समाज में विभाजन होगा।
    तीन, जातिवादी हिंसा को बढ़ावा मिलेगा।
    चार, प्रशासन कमजोर होगा।
    पांच, समाज में हमेशा के लिए एक ‘परजीवी’ वर्ग पैदा होगा जो मेहनत और मेधा की जगह कोटे से नौकरी पाने और आगे बढ़ने में यकीन रखेगा।
    छह, अगर आरक्षण से प्रशासन कमजोर नहीं होता है तो फिर सेना में आरक्षण क्यों नहीं दिया जाता?
    आरक्षण की जगह सभी पिछड़ों और दलितों को अगड़े वर्ग के बच्चों के बराबर आने के लिए व्यवस्था की जानी चाहिए जैसे मुफ्त शिक्षा हो, शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करने के लिये स्कॉलरशिप दी जाए। रुचि के हिसाब से मेधावी छात्रों को सरकारी नौकरिय़ों की प्रतियागी परीक्षाओं के लिए मुफ्त तैयारी की सुविधा प्रदान की जाए। पिछड़ों को अगड़ों के बराबर लाकर उन्हें प्रतियोगिता में प्रतिस्पर्धा के लिये छोड़ देना चाहिए। यानी समानता के सिद्दांत के मुताबिक समान अवसर सबको मिलें और कोई वर्ग ये महसूस न करे कि उसका हक मारा गया।
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